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प्रेषिका : शिल्पा त्रिपाठी

प्रिय पाठको, मैं शिल्पी उम्र बीस साल लक्ष्मीनगर, दिल्ली में रहती हूँ। जब मैं छटी कक्षा में थी तो मेरी माँ ने मुझे शिमला पढ़ने भेज दिया। ग्यारहवीं तक तो मैंने वहीं पढाई की लेकिन जब मैं बारहवीं में पहुँची तो मेरे साथ एक अजीब घटना घट गई। आज मैं आप सबको वही घटना बताने वाली हूँ।

शिमला में हमारा अपना एक छोटा सा घर था। मम्मी-पापा दिल्ली में रहते थे तो शिमला का घर खाली पड़ा था। ग्यारहवीं तक मैं हॉस्टल में थी लेकिन बारहवीं में जाने के बाद मैं अपने घर में रहने लगी। मैं खूबसूरत हूँ, कोई भी लड़का मुझे देख कर आह भरे बिना नहीं रह सकता, उस पर 32-25-32 की 18 साल की जवानी भी थी। मैं नए ज़माने की लड़की थी इसलिए कपड़े भी सेक्सी पहनती थी। मेरे घर के सामने एक और घर था उसमें चार लड़के रहते थे वो एक साथ बी.ए तृतीय में पढ़ते थे, उम्र में वो मुझसे लगभग चार साल बड़े थे।

जिस दिन से मैं अपने घर में रहने आई, उनकी नज़र मुझ पर रहती थी। मेरे घर के सामने एक बरामदा था जिसमें कुर्सी लगी थी। मैं अकसर शाम के समय वहाँ बैठ कर पढ़ती थी। घर में कोई और तो था नहीं, सिर्फ एक खाना बनाने वाली थी, समय से आती खाना बना कर और सफाई करके चली जाती।

एक दिन मैं स्कूल से घर आई तो देखा कि चार में से एक अपने घर के बाहर खड़ा होकर मेरे घर की तरफ देख रहा है। मैं उसका इरादा समझ गई। जवानी मेरी भी काबू में नहीं थी, घर में आकर मैं शीशे के सामने खड़ी हो गई और खुद को देखने लगी। मैंने जानबूझ कर दरवाजा खुला छोड़ दिया ताकि वो मुझे देख सके।

मैंने अलमारी से अपने लिए काले रंग की सिल्क की ब्रा और पैंटी निकली और फिर शीशे के सामने आ गई। वो अब भी लगातार मेरे कमरे में देख रहा था, शीशे में मुझे वो दिख रहा था।

मैंने अपने शर्ट के बटन खोल दिए और धीरे से उसे अपने शरीर से अलग किया। वो देख कर थोड़ा सजग हो गया, उसने अंदर से अपने तीनों दोस्तों को भी बुला लिया।

मैं स्कूल ड्रेस के नीचे ब्रा और पैँटी नहीं पहनती थी। मैंने पहले पैंटी पहनी और फिर स्कर्ट भी उतार दिया अब वो चारो मुझे पीछे से केवल पैंटी में देख रहे थे। फिर मैंने ब्रा पहनी और उसी तरह घूम कर शीशे की तरफ पीठ करके अपना हुक बंद किया। मेरी चूचियाँ और चिकनी नाभि देख कर वो चारों वासना के सागर में गोते लगाने लगे।

फिर मैंने अलमारी में से एक नीली स्कर्ट और गुलाबी टॉप निकाली और वापिस शीशे के सामने आ कर मैंने स्कर्ट पहना जो घुटने के कुछ ऊपर तक ही था। फिर टॉप जो चूचियों के कारण नाभि के ऊपर ही अटक जाता था। फिर मैं घूम के दरवाजे तक आई और ऐसा दिखाया कि मैंने उन्हें देखा ही नहीं।

थोड़ी देर बाद मैं किताब ले कर बाहर कुर्सी पर बैठ गई वो चारों अब भी वहीं थे, मेरी गोरी टांगें और चूचियाँ देख देख कर पागल हुए जा रहे थे।

तभी खाना बनाने वाली आ गई, लगभग डेढ़ घंटे तक वो घर में रही, खाना बनाया और फिर बाहर आकर बोली- मैंने खाना बना दिया है, खा लेना ! अब मैं जाऊँ?

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