ट्रेन का सफ़र

प्रेषक : कमलेश सिंह

गुरु जी को प्रणाम …और सभी अन्तर्वासना के पाठकों को नमस्कार !

मेरा नाम कमलेश है, मैं रहने वाला रायपुर छ्त्तीसगढ़ का हूँ, मेरी पढ़ाई भोपाल में हुई है।

मैंने अन्तर्वासना अभी अभी पढ़ना शुरू किया है मुझे भी लगा की मुझे भी अपनी कहानी लिखनी चाहिए !

यह उस वक्त की कहानी है जब मेरी पढ़ाई खत्म हो गई थी और उसके बाद मैं रायपुर वापस आ रहा था, यह मेरी जिंदगी की सच्ची घटना है।

मैं भोपाल से ट्रेन में बैठकर नागपुर आया, वहाँ मुझे कुछ काम था। नागपुर से रायपुर के लिए रात में ट्रेन थी, उसी में मुझे आना था।

मैं जल्दी ही काम ख़त्म करके स्टेशन पहुँच गया था, बहुत कम ही लोग स्टेशन पर थे, मैं समय काटने के लिए स्टेशन पर घूमने लगा।

कुछ दूर एक 30-32 साल की एक आंटी बैठी थी जो अकेली ही थी, रंग गोरा था, 34-32-36 का फिगर था, क़यामत लग रही थी।

मेरी नजर बार बार उनको ही देख रही थी।

अचानक उन्होंने मुझसे ट्रेन का समय पूछा।

मैंने कहा- ट्रेन आधा घंटा देरी से चल रही है।

मैंने देरी न करते हुए उनसे पूछा- आप कहाँ जा रही हैं?

उन्होंने कहा- रायपुर !

मैं बहुत खुश हो गया, मैंने भी बताया उन्हें कि मैं भी रायपुर जा रहा हूँ।

ऐसे हमारी बात होने लगी, उन्होंने बताया कि वो अपनी बहन के यहाँ जा रही हैं, नागपुर में ही उनका घर है, रायपुर अकसर जाती रहती हैं।

मैंने अपने बारे में बताया- मेरी पढ़ाई ख़त्म हो गई है ओर मैं अपने घर वापस जा रहा हूँ। वहाँ जाकर कोई जॉब करूँगा !

बातों बातों में ट्रेन आ गई, हम एक ही डब्बे में चढ़ गए।

रात का सफ़र था, ट्रेन में भीड़ भी बहुत थी। बैठने की जगह नहीं थी।

एक जगह मिली तो मैंने आंटी को बैठने को कह दिया और मैं खड़े हो गया।

कुछ देर बाद ट्रेन कुछ ख़ाली हुई, आंटी ने अपने बगल में बैठने को कहा तो मैं चुपचाप बैठ गया।

हम घर परिवार की बातें करने लगे। रात का एक बज गया था, सभी सो रहे थे, आंटी को भी नींद आ रही थी, वो भी थोड़ी देर में सो गई !

मुझे नींद नहीं आ रही थी। इतनी सेक्सी आंटी बगल में बैठी हो तो नींद कैसे आ सकती थी।

सोते-सोते उनका सर मेरे कंधों पर आ गया था, मैं उनके वक्ष को देखे जा रहा था, उनके ब्लाउज से थोड़ा-थोड़ा दिख रहा था।

अचानक उनका एक हाथ मेरे जांघों पर आ गिरा, फिर सरकते-सरकते मेरी जिप के पास चला गया।

मेरा लंड उनके हाथ के एहसास से खड़ा हो गया था, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था तो मैंने वैसे ही रहने दिया उनका हाथ।

फिर थोड़ी देर बाद आंटी मेरे लंड को सहलाने लगी।

मुझसे रहा नहीं गया, मैं बेचैन होने लगा। लंड पैंट फाड़ कर बाहर आने को तो तैयार था !

मैंने आंटी के कान में कहा- चलो, बाथरूम में चलते हैं।

वो तैयार हो गई।

पहले वो चली गई, बाद में मैं गया।

सब सो रहे थे किसी ने हमे नहीं देखा।

अब बस आंटी और मैं बाथरूम में थे।

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