पुरानी शराब का नशा

राज कार्तिक

रंगीन और मस्त जिंदगी की ख्वाहिश हर इंसान करता है पर सबके नसीब में मस्ती से जीना नहीं होता। यह अलग बात है कि जिंदगी में कम से कम एक बार कुछ हसीन पल जरूर आते हैं जिन्हें अगर जी लिया जाए तो तमाम जिंदगी उन हसीन पलों की खुशबू जीवन को एक सुखद एहसास दिलाती रहती है।

जब भी आप अकेले होते हैं तो उन हसीन पलों को याद करके आप का तन मन महक उठता है। ऐसा ही एक किस्सा मैं आपको बताने जा रहा हूँ। मुझे तो आप जानते ही हैं ना।

बात तब की है जब मैंने अपनी पहली नौकरी ज्वाइन की थी। तब मैं दिल्ली में रहता था। दिल्ली में मेरे शुरुआती दिन कैसे बीते, यह जानने के लिए मेरी कहानी
दोस्त दोस्त ना रहा
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नौकरी लगने के बाद मैंने कबीर के साथ रहना छोड़ दिया था और नांगलोई में एक अलग कमरा लेकर रहने लगा था। मुझे खाना बनाना नहीं आता था तो मुझे अब दिक्कत होने लगी थी क्यूंकि पहले तो कबीर के घर ही खाना पीना हो जाता था। मैंने एक टिफिन सर्विस शुरू करवा ली पर वो खाना पसंद आने लायक नहीं था।

तभी एक दिन मेरे पिता जी दिल्ली आये और एक रात के लिए मेरे पास रुके। रात को उन्होंने जब वो खाना खाया तो बहुत दुखी हुए।

अगले दिन पिता जी के जाने के बाद रात को घर से फोन आया और मुझे घर पर बुलाया। मैं छुट्टी लेकर गाँव चला गया। सबने मिल कर फैसला किया कि या तो घर से कोई मेरा खाना बनाने और घर के काम के लिए मेरे साथ चला जाए या फिर कोई अच्छा इंतजाम किया जाए। पर इंतजाम क्या किया जाए?

सुबह मेरी समस्या का कुछ हल निकलता महसूस हुआ। मेरी एक चाची ने मेरी माँ को कहा कि उसकी माँ बहादुरगढ़ में अकेली रहती हैं, अगर मैं उसके पास रहने लगूँ तो उसकी माँ का भी अकेलापन खत्म हो जाएगा और मेरी रोटी का भी इंतजाम हो जाएगा। नांगलोई से बहादुरगढ़ ज्यादा दूर भी नहीं था। यह सोच कर कि बुढ़िया के साथ रहना पड़ेगा मैंने मना कर दिया।

पर फिर भी चाची ने जोर देकर एक बार मिलने को कहा तो मैंने चाची को कहा- आप एक बार साथ चलो, अगर पसंद आया तो रह लूँगा।

चाची मेरी माँ के कहने पर तैयार हो गई। अगले ही दिन हम बहादुरगढ़ के लिए निकल लिए। पूरे रास्ते चाची अपनी माँ के बारे में ही बात करती रही।

आखिर हम दोनों बहादुरगढ़ पहुँच गए। रिक्शा में बैठ कर हम दोनों चाची के घर की तरफ चल दिए। छोटी सी रिक्शा और खड्डों से भरी सड़क पर मैं चाची से बिल्कुल चिपक कर बैठा था और चाची भी हर खड्डे पर मेरी बाँह पकड़ कर मुझसे चिपक जाती। कबीर की माँ को चोदने के बाद मुझे भी अधेड़ उम्र की औरतें बहुत पसंद आने लगी थी। चाची की उम्र भी यही कोई तीस बत्तीस साल होगी। दो बच्चों की माँ थी वो पर उसके बदन के स्पर्श से मेरी पैंट के अंदर हलचल होनी शुरू हो गई थी।

मैं अब अंदर ही अंदर उत्तेजित होने लगा था और मैं जानबूझ कर अपनी कोहनी से चाची की चूची को सहलाने लगा था। चाची की बड़ी बड़ी चूचियों को कोहनी से सहलाने में बहुत आनन्द आ रहा था। रिक्शा वाला मस्ती में चला जा रहा था।

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