मेरी प्यारी आवृति

लेखक : परेश गुप्ता
मेरा नाम परेश गुप्ता है, मैं एक सॉफ्टवेर कंपनी में पुणे में जॉब करता हूँ। मैं अपने जीवन में कभी ज्यादा लड़कियों के पीछे नहीं भागा, लेकिन मुझे अपने कॉलेज में एक लड़की से प्यार हुआ था, उसका नाम श्रेया था, बहुत सुन्दर थी वो, थोड़ी मोटी थी दिखने में, लेकिन आदत-व्यवहार की बहुत ही अच्छी थी। उसका रंग एकदम दूध की तरह गोरा था और स्तन तो बहुत बड़े थे, उसका कॉलेज का रोल नंबर ठीक मेरे बाद था, तो सारे प्रैक्टिकल्स और वायवा ग्रुप में मेरे साथ ही होती थी, मैं अक्सर उसकी मदद कर दिया करता था और वो भी मुस्कुरा कर मदद लिया करती थी।
लेकिन मेरी उसको कुछ बोलने की हिम्मत नहीं होती थी, उसके पीछे बहुत से लड़के लगे रहते थे, जो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसको कॉलेज में किसी और लड़के ने प्रपोज़ कर दिया और उसने उसको हां कर दी, मुझे पता लगा तो बड़ा दुःख हुआ लेकिन मैंने जैसे तैसे अपने मन को समझाया और पढ़ाई पर ध्यान दिया।
कॉलेज से निकलकर मेरी बात मेरी बचपन की दोस्त आवृति से हुई, हम लोग प्राइमरी स्कूल में साथ में पढ़े थे, उसके बाद कभी मुलाक़ात नहीं हुई।
एक दिन अचानक उसकी फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट आई और मैंने स्वीकार कर ली, हमारी बात शुरू हुई, मैंने पूछा- कहाँ हो? कैसी हो? आवृति दिखने में तो उतनी सुन्दर नहीं थी लेकिन उसके नयन-नक्श बहुत तीखे थे, स्तन एकदम सही आकार में, रंग सांवला और बहुत ही चुलबुली सी लड़की।
उसको भी मैं बचपन से ही पसन्द करता था, जब उसने बताया कि उसकी शादी हो गई है तो मुझे बुरा लगा, लेकिन फिर उसने कहा कि वो बस मेरी प्रतिक्रिया देखना चाह रही थी, असल में उसकी शादी नहीं हुई है।
मुझे एक राहत सी मिली।
वो दिल्ली में रहती थी, हमारी अक्सर फ़ोन पर बातें होने लगी, उसने मुझे ‘आई लव यू’ भी बोल दिया, हमारी लगभग रोज़ सुबह शाम फ़ोन पर बातें होने लगी, अब हम लोगों की मुलाक़ात बहुत ज़रूरी थी, मैंने मिलने का प्रोग्राम बनाया, दिल्ली जाने का, उसने कहा कि वो  ऐसी जगह मिलना चाहती हैं, जहाँ सिर्फ वो और मैं हों, ताकि वो अपने मन की बात खुलकर कर सके।
वैसे मेरे लिए इतना सुराग काफी था, फिर भी मैंने होटल बुक करने से पहले उससे बात करके सुनिश्चित किया।
नियत समय पर मेरी फ्लाइट दिल्ली पहुँची, वहाँ पहुँचकर मैंने उसको फ़ोन करके होटल पहुँचने कहा और खुद ऑटो लेकर करीब एक घंटे में होटल पहुँचा।
वो अभी तक नहीं आई थी, मुझे बहुत गुस्सा आया, मैंने दोबारा फ़ोन किया तो बोली- नहाने में देर हो गई।
मैं आवृति की प्रतीक्षा करने लगा और एक घंटे बाद वो आई।
हम लोगों ने होटल में चेक-इन किया और अपने कमरे में गए। वो काफी घबराई हुई लग रही थी, मैंने उसको आराम से बैठने को कहा, ए.सी. का टेम्प्रेचर कम किया, ताकि उसको ठण्ड लगे और वो बिस्तर में मेरे करीब आ सके।
और वो नज़दीक आने लगी, मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया, उसकी धड़कनें बढ़ने लगी थी, उसके सीने का बार बार उठना बता रहा था।
मैंने कहा- घबराओ मत, मैं तुम्हारी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं करूँगा।
वह मेरे लिए कुछ बना कर लाई थी खाने के लिये, मुझे अपने हाथों से खिलाने लगी और मैं बीच बीच में उसकी उंगली चूस लेता या काट लेता, उसको भी मज़ा आ रहा था।
तभी मैं अपने होंठ उसके नज़दीक ले गया लेकिन चुम्बन नहीं किया, सिर्फ अपनी गर्म साँसें उसकी साँसों से मिलने दी।
उससे रहा नहीं गया और आगे बढ़ कर मुझे चूमने लगी। यह मेरा पहला चुम्बन था।
हम लोग बहुत डूब कर काफी देर तक चुम्बन-प्यार करते रहे, उसकी जीभ को चूसा, उसने मेरी जीभ को चूसा, वो नीचे लेट गई और मैं उसके ऊपर से उसको प्यार करने लगा। धीरे धीरे मैं उसकी गर्दन की तरफ बढ़ा, अब उसके मुख से सिसकारियाँ निकलने लगी, मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था।
वो कहने लगी- परेश, आई लव यू वैरी मच !
अब मेरी हिम्मत बढ़ी तो मैंने अपना हाथ उसके वक्ष की तरफ बढ़ाया और हल्के से उसके एक स्तन पर रखा, मुझे लगा कहीं बुरा न मान जाए, इसलिए बस रखा ही था, उसने कुछ नहीं कहा तो मैंने दबाना भी शुरू कर दिया।
बहुत मुलायम और बड़े स्तन थे उसके, मैंने खूब मन भर के दबाया उनको, वो भी मुझे चूम रही थी। फिर मेरा मन हुआ उन प्यारे से खरबूजों को देखने का, मैंने उसके कुरते के अन्दर हाथ डाला तो उसने कहा- मुझे शर्म आती है, लाईट बंद कर दो।
मैंने लाईट बंद की और पर्दा हल्का खोल दिया ताकि कमरे में थोड़ी रोशनी रहे, फिर उसका कुरता उतार दिया, उसके स्तन सफ़ेद रंग की ब्रा में काफी कसे हुए थे, मेरी उंगलियाँ भी नहीं जा पा रही थी उसकी ब्रा के अन्दर, मैंने उसको कहा ब्रा निकालने को !
उसने कहा- खुद ही उतार लो !
मैंने कोशिश की ब्रा का हुक खोलने की पर खोल नहीं पाया, मुझे इस काम का अनुभव नहीं था ना !
फिर मैंने उससे ही कहा तो उसने खुद ही अपनी ब्रा का हुक खोल दिया।
क्या हुस्न था उन मुलायम स्तनों का ! और निप्पल भूरे रंग के, बहुत ही बड़े बड़े !
मुझमें जोश आया तो मैंने काफी कसके दबा दिए, उसके मुख से चीख निकल पड़ी, बोली- मेरे शरीर का ही हिस्सा हैं, आराम से प्यार करो !
मैंने फिर हल्के हल्के दबाना शुरू किया।
उसने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा लंड टटोलना शुरू किया, तो मैंने उसको जीन्स में से निकालकर हाथ में दे दिया।
वो बोली- कितना मोटा है।
अब वो काफी खुलने लगी थी, मेरे ऊपर आकर अपने स्तन मेरे मुँह पर रख दिये और मेरा लंड सहलाने लगी। मैंने पहली मुलाक़ात में इतनी उम्मीद नहीं की थी।
अब उसने मेरे कपड़े निकालना शुरू कर दिया और मेरे सारे कपड़े उतार दिए, मेरे सीने पर चुम्बन करना शुरू किया तो मैं बहुत उत्तेजित हो गया, मैंने उसको अपना लंड चूसने को कहा, और मेरी उम्मीद के विपरीत उसने चूसना शुरू कर दिया, ऊपर से नीचे तक, मेरी जांघो पर भी चुम्बन किया, मेरी गेन्दों को भी चूसने लगी, मेरी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना नहीं रहा।मैंने भी उसके स्तनों को खूब मसला और देखा उसके निप्पल काफी बड़े हो गए थे, मैंने उनको काटना शुरू किया, तो वो बोली- धीरे धीरे करो !
अब मैंने उसकी सलवार भी निकाल दी, और पैंटी में हाथ डाल दिया, उसकी चूत काफी गीली थी, मैंने उसमें उंगली घुसा दी, अचानक से हुए इस हमले से वो उछल पड़ी और बोली- कितने शरारती हो तुम !
फिर मैंने जब उसकी पैंटी निकालने की कोशिश की तो उसने मुझे रोक दिया। मैंने भी सोचा था कि उसकी मर्ज़ी से करूँगा सब कुछ, तो मैंने उसकी कच्छी नहीं निकाली।
अब वो फिर से मेरे लंड को चूसने लगी, बहुत चूसने लगी, मेरा वीर्य निकलने वाला था, तो मैंने उसको पूछा- मेरा लिंग-रस पियोगी क्या?
तो उसने कहा- मेरी चूचियों पर निकाल दो !मैंने उसके स्तनों को अपने गर्म गर्म रस से भिगो दिया, बहुत सारा निकला था, मैं कोई कपड़ा देखने लगा उनको साफ़ करने के लिए, तो उसने अपने नए दुपट्टे से उनको पोंछ लिया, वो बोली- यह रस गन्दा नहीं है, यह तो तुम्हारे बदन से निकला कामरस है तो मेरे लिए बहुत अच्छा है।
वो अपने स्तनों को मेरे सीने पर रख कर मेरे बहुत देर तक प्यार करती रही, मेरे लंड को एक बार फिर से चूस कर इस बार रस उसके चेहरे पर छोड़ा।
हम लोग साथ में नहाए भी, लेकिन मैंने उसकी चुदाई नहीं की, उसकी चुदाई बहुत ज़ोरदार हुई हमारी अगली मुलाक़ात में !
उस दिन तो उसने मुझे लंड चूस चूस कर तीन बार झड़वाया, और उसकी चूत ने भी 2-3 बार पानी छोड़ा।
यह मेरी सच्ची कहानी है, केवल नाम काल्पनिक हैं, अपने विचार मुझे भेजें, ताकि मैं अपनी अगली कहानी भेज सकूँ।
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