पुरानी क्लासमेट की चुदास-1

जय पटेल 2014-04-07 Comments

हैलो दोस्तो, मेरा नाम जय है, नागपुर का रहने वाला हूँ, मैं 21 साल का हूँ और मेरी हाइट 6 फ़ीट है।

बात उन दिनों की है, जब मैंने हाई स्कूल पास किया और इंटर में एडमिशन लेने के लिए कोशिश कर रहा था। हालांकि मेरे मार्क्स अच्छे थे, पर मैं जिस कॉलेज में एडमिशन लेना चाहता था उसके हिसाब से कुछ कम थे। मेरे सब दोस्त एडमिशन ले चुके थे, पर मैं उसी कॉलेज में एडमिशन लेना चाहता था।

एक दिन मैं फॉर्म सब्मिट करने की कोशिश कर रहा था… कि एक लड़की मेरे पास आई।
उसने कहा- हैलो जय!

मैंने उधर पलटकर देखा वो ही आँखें वो ही सीना वो ही मुस्करता चेहरा। अब आप सोच रहे होंगे यह कौन है और कहाँ से आई। तो ये है वो आज की इस स्टोरी की हिरोइन। जी हाँ ‘शिप्रा’!

दरअसल हम लोग तीसरी क्लास से एक साथ एक ही स्कूल में पढ़ रहे थे, पर हम लोगों मैं कभी बात नहीं हुई, लेकिन आज उसने मुझे ‘हैलो’ बोला, तो कुछ देर तक मेरे मुँह से कुछ नहीं निकला।

फिर उसने कहा- फॉर्म सब्मिट करना है?
मैंने कहा- हाँ!
तो उसने कहा- फॉर्म मुझे दे दो और मेरे साथ आओ।

मैं बिना कुछ बोले उसके पीछे हो लिया। तब वो मुझे साइंस के डिपार्टमेंट में ले गई और अपने अंकल से मिलाया और कहा- मैं इनको फॉर्म दे देती हूँ, आपका काम हो जाएगा।
पर मैंने कहा- मेरे मार्क्स कुछ कम हैं!
तो अंकल ने कहा- कोई बात नहीं.. शिप्रा तुम्हें अप्रोच कर रही है, तो तुम्हारा काम हो जाएगा।

हम लोग डिपार्टमेंट से बाहर आए तो मैं शिप्रा से बोला- शिप्रा धन्यवाद!
उसने कहा- किस बात के लिए?
मैंने कहा- तुमने एडमिशन में मेरी हेल्प की इसलिए।

उसने कहा- हम लोग एक-दूसरे को काफ़ी टाइम से जानते हैं, तो दोस्त हैं और सच पूछो मेरी सभी फ्रेंड्स ने एडमिशन अलग-अलग कॉलेज में ले लिया और यहाँ मैं अकेली थी। अंकल की वजह से मैंने यहाँ एडमिशन लिया, लेकिन कोई परिचित का ना होने की वजह से मैं चाह रही थी कोई ऐसा हो जिसे मैं यहाँ जानती होऊँ ताकि क्लास अटेंड करने में बोरियत महसूस ना हो। तभी तुम मुझे दिखे और मैं आपके मार्क्स जानती थी, इसलिए मैंने सोचा आप दोस्त भी हैं और जिस तरीके से आप एडमिशन ले रहे हैं, वैसे तो एडमिशन होना नहीं है। इसलिए मैं और आपको अपने अंकल के पास ले गई, तो नाउ वी आर फ्रेंड्स।

तब मैंने अपना हाथ मिलाने के लिए उसकी तरफ बढ़ाया और कहा- श्योर… वाइ नॉट!

जब इतनी बातें हम दोनों के बीच में हो गईं, तब मुझमें कुछ हिम्मत जागी और मैंने कहा- शिप्रा, क्या तुम मेरे साथ कॉफी पीने चलोगी?

उसने कहा- अगर यह रिश्वत है तो नहीं और अगर एक दोस्त दूसरे दोस्त से पूछ रहा है तो श्योर!

मैंने कहा- रियली, एक दोस्त दूसरे दोस्त से पूछ रहा है।

फिर हम लोग कॉफी पीने गए और ढेर सारी पुरानी बातें की। कैसे आज तक मैं इतने सालों से उससे बातें करना चाहता था, पर ना कर सका। इस प्रकार हम दोनों में दोस्ती हुई, जो पिछले 8 सालों से सिर्फ़ एक-दूसरे को देख रहे हों, बातें ना करते हों और अचानक वो इतनी जल्दी दोस्त बन जाते हैं। है ना लक…

इसलिए मैंने यह सब रामकथा आप लोगों को सुनाई। चलो अब अगर आप बोर हो गए हों तो ज़रा अटेंशन हो जाए क्योंकि अब मैं शिप्रा की जवानी के बारे में बताने जा रहा हूँ।

दरसल शिप्रा एक नाटे कद की साँवली लड़की थी। उसका चेहरा साधारण था, मेरा मतलब एक आम लड़की के जैसा। उसके बावजूद वो ‘गुड-लुकिंग’ थी। लेकिन उसमें जो सबसे आकर्षक था, वो थे उसके मम्मे। उसकी छोटी सी बॉडी में छोटी फुटबॉल जितने बड़े मम्मे। सच बताऊँ.. मैं जब से उसे जानता था, उसको कम, उसके मम्मे ज्यादा देखता था।

यह सिर्फ़ मैं नहीं करता था, हर वो लड़का, टीचर, लड़की करते थे कि उसका चेहरा नहीं, उसके मस्त मम्मे देखते थे। क्यूँकि उसकी काया में अगर कुछ आकर्षक था तो वो थे उसके मम्मे। ये मम्मे ही उसे सेक्सी, हॉट और मज़ेदार बनाते थे। मैं अक्सर ख्यालों में उसके मम्मों को अपने हाथों में लेता था, पर कमबख्त आते ही नहीं थे। बहुत बड़े थे न!

इंटर की क्लासें शुरु हो गईं, हम दोनों अगल-बगल में बैठते थे और पढ़ाई के साथ मजाक भी करते, कैंटीन में जाते, बातें भी करते और एक-दूसरे के साथ मज़ाक भी करते। फिर मैं उसे कॉलेज से उसके घर और घर से कॉलेज लाने ले जाने लगा।

जब घर से वो निकलती अकेले, मैं कुछ दूर पर उसका इंतज़ार करता और वो आकर मेरी मोटरसाईकल पर बैठ जाती और कॉलेज घर जाते टाइम मैं उसे घर से पहले छोड़ देता।

एक दिन उसने अपनी जन्मदिन में मुझे अपने घर बुलाया और सबसे मिलाया। मैंने उसके मम्मी और पापा के चरण छुए और उसकी एक बड़ी बहन थी सुनीता, लेकिन उससे बिल्कुल अलग, पर एक चीज़ सेम थी मालूम है क्या? उसके मम्मे! शायद शिप्रा से भी बड़े क्योंकि वो शिप्रा से दो साल बड़ी थी। उस दिन से मेरा उसके घर आना-जाना शुरू हो गया।

कुछ दो या तीन महीने निकल गए इन सब में। अब मैं कभी कभी पढ़ाई करने भी उसके घर जाने लगा। मेरा मतलब हम दोनों एक-दूसरे के क्लोज़ हो गए। हमने कभी ‘आई लव यू’ नहीं कहा। क्यों…! यह बात फिर कभी….पर बताऊँगा ज़रूर।

तो शायद अब आप लोग पूरी तरीके से समझ गये होंगे। तो अब मैं उस दिन की बात बताने जा रहा हूँ जिसके लिए आपने इतना सारा पढ़ा और मुझे शायद गाली भी दी होगी। तो मेरे बेसब्र दोस्तो, सब्र रखो क्योंकि सब्र का फल मीठा होता है। तो मैं शुरु करता हूँ।

उस दिन रविवार था, जब मैं उसके घर गया। मैंने कॉल-बेल दबाई.. अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। कुछ देर बाद मैंने दुबारा घण्टी बजाई, तभी अंदर से मधुर सी आवाज़ आई- कौन है?

मैंने कहा- मैं… विक्की!
उसने कहा- एक मिनट।

दरवाज़े के बाहर मैं इंतज़ार करने लगा और कुछ सोचने जा ही रहा था कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और खुल गया, पर दरवाज़े पर कोई नहीं…!

मैं देख ही रहा था कि फिर से वो ही आवाज़ आई- अरे जल्दी अंदर आओ, क्या वहीं खड़े रहोगे!
झट से मैं अंदर घुसा और जैसे अंदर घुसा तभी दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई और मैं पलटा और पलटते ही दंग रह गया..!

वो भीगे हुए बदन एक घुटनों से भी ऊपर तक के गाउन से डाले हुई थी और जाँघों के नीचे से नंगे पैर….! वो जो नज़ारा था या कोई कयामत था!

वह कोई और नहीं अपनी फिल्म की हिरोइन शिप्रा थी। उसने मेरी तरफ देखा और कहा- तुम 5 मिनट वेट करो, मैं बस अभी आती हूँ।

और मुझे हतप्रभ सा वहीं छोड़ गई। मैं कुछ समय के बाद नॉर्मल हुआ और सोफे पर बैठ गया। कुछ देर बाद एक लो-कट टी-शर्ट और ब्लू रंग की स्किन टाइट जीन्स पहने हुए भीगे बालों को पोंछते हुए वो मेरे सामने आई और कहा- अरे! क्या हुआ ठीक से बैठते क्यों नहीं हो…!

मैंने अपने आप को ठीक किया और नॉर्मल दर्शाने के लिए पूछा- आज कोई दिख नहीं रहा!

शिप्रा ने कहा- दिखेंगे कैसे! जब कोई होगा तब ना! मम्मी-पापा और दीदी चन्द्रपुर गए हैं शादी में, देर रात को आएँगे। मेरा मन नहीं था इसलिए नहीं गई।

मैं अंदर ही अंदर बहुत खुश हुआ और अपने अंदर हिम्मत भी आ गई।

तो मैंने कहा- हम्म… तो आज तुम अकेली हो!
उसने कहा- अकेली! नहीं तो, किसने कहा?
मैंने कहा- मम्मी-पापा और दीदी सब चले गये, फिर कौन है तुम्हारे साथ?
उसने कहा- तुम हो ना…!

मेरे मुँह से ज़ोर सी हँसी निकल गई… और वो भी हँस दी।

तभी उसने कहा- रियली!! मैं अभी तुम्हें फ़ोन करने वाली थी, मैं यहाँ अकेली हूँ तुम आ जाओगे तो साथ भी हो जाएगा, स्टडी भी हो जाएगी और समय भी कट जाएगा। अच्छा तुम दो मिनट बैठो मैं कॉफी ले के आती हूँ।

मेरी नज़र ना चाहते हुए भी बार-बार उसके मम्मों की तरफ जा रही थी। भीगे बालों में वो इतनी सेक्सी लग रही थी कि एक बारी तो मेरा लंड खड़ा होते होते बचा…!

आज मैं शिप्रा की चूचियाँ दबा कर ही मानूँगा चाहे जो हो जाए पर कैसे? कहीं चिल्ला दी तो? अरे नहीं इतने सालों से जानती हैं नहीं चिल्लाएगी! लेकिन अगर कहीं बुरा मान गई तो दोस्ती टूट गई तो…? फिर क्या किया जाए… कैसे शिप्रा की चुदाई करूँ…! कुछ समझ में नहीं आ रहा है…

कहानी का अगला भाग: पुरानी क्लासमेट की चुदास-2

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