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बदलते रिश्ते-2

प्रेषक : एक्समैन

सभी मेरी इन हरकतों से हैरान थे पर सबको लगा कि शायद में पेपर्स की वजह से टेंशन में हूँ इसलिए ऐसा कर रही हूँ।

पर आज तो पेपर भी ख़त्म हो गये थे और मैं आखिरी पेपर भी अच्छे से देकर हल्के मन के साथ घर की तरफ जा रही थी।

अरे दीदी ! आपका पेपर कैसा हुआ?" मेरा लुचा मुँह बोला भाई फिर जाने कहाँ से रास्ते में टकरा गया। और आज उसके साथ एक दोस्त भी था।

"तुमसे मतलब?" मैंने गुस्से से कहा और गुस्से से भरी साँसें छोड़ते हुए आगे बढ़ गई।

"लगता है आपका पेपर अच्छा नहीं हुआ ! पर उसका गुस्सा आप मुझ पर तो ना उतारो दीदी। वैसे आप कुछ दिनों से मुझसे उखड़ी-उखड़ी हैं, अच्छे से बात नहीं कर रहीं। क्या बात है? मुझसे कोई ग़लती हो गई क्या?"वो बोला।

"नहीं ! और प्लीज़ मुझे अकेला छोड़ दो !" मैंने फिरे थोड़े उखड़े से मूड में कहा।

"लगता है आप क़िसी बात से मुझ से नाराज़ हैं। प्लीज़ दीदी मुझे बताओ तो सही आख़िर बात क्या है?" उसने पूछा पर मैं चुप रही।

"अच्छा चलिए, मैं आपको घर तक तो छोड़ दूँ!" वो बोला।

"नो थैंक्स ! मैं अपने आप चली जाऊँगी" मैंने कहा और मैं आगे चल पड़ी।

"क्या बात क्या है?" उसके दोस्त ने उससे पूछा।

" क्या तुम लोगों में कोई प्राब्लम हो गई है? तुम तो कहते थे कि तुम्हारे परिवार के इनके परिवार के साथ अच्छे रिलेशन्स हैं। फिर बात क्या है?" उसका दोस्त आगे बोला।

पर वो थोड़ा लाजवाब सा हो गया था और मुझे लगा कि कहीं बात बिगड़ ना जाए और कहीं हमारी परिवार के या मेरी बहन की कोई बदनामी ना हो जाए। यह सोच कर मैं बोली,

"सॉरी भैया! मेरा मूड थोड़ा ऑफ है। मेरे पिछले कुछ पेपर पहले जैसे अच्छे नहीं हुए। मेरी बातों का आप बुरा मत मानना। आप प्लीज़ मुझे मेरे घर तक छोड़ दो।"

मैं यह झूठ बोल कर उसके बाइक पर बैठ गई।

"मैं दीदी को 2 मिनट में घर छोड़ कर आया। तू तब तक यहीं रुक !" मेरा लुच्चा भाई अपने दोस्त से बोला और उसने मोटरसाइकल मेरे घर की तरफ सरपट दबा दी।

रास्ते में जहाँ-जहाँ वो ब्रेक लगाता मेरी छातियाँ उसकी पीठ में धंस जाती। ऐसा पहले भी होता था लेकिन तब मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था। मुझे लगता था कि यह आजकल के छोकरे इतनी तेज़ बाइक चलाते हैं कि पीछे वाला ब्रेक लगने पर आगे ही तो गिरेगा।

पर आज जब जब उसने ब्रेक लगाए और मेरी छातियाँ उसकी पीठ में धसीं तब गुस्से से मेरे शरीर के रोएँ खड़े हो गये। दिल करता था कि अभी बाइक रुकवा के नीचे उतर कर और इसे जम कर झापड़ लगाऊँ। पर मैंने कुछ ना कहा। सारे रास्ते चुप रही और अब उसने भी कुछ नहीं पूछा। घर पहुँचते ही मैं चुपचाप उसकी बाइक से उतरी और घर के अंदर चली गई और वो अपनी बाइक दौड़ाता अपने रास्ते चला गया।

पेपर अच्छा होने की सारी बात मैं अब भूल चुकी थी और मेरी आँखों के सामने बार बार सिर्फ़ उसका और मेरी बहन का उस रात का भद्दा, नंगा और घटिया कामुक दृश्य घूम रहा था। मुझे इस बात पर रह रह कर गुस्सा आ रहा था कि एक छोटा सा प्यारा सा लड़का जिससे मैं और मेरी बहन अपने सगे भाई से भी बढ़ कर मानते थे, वो कैसे इतना लुच्चा, कमीना और गिरा हुआ इंसान बन गया जिसे अपनी मुँह बोली बहन के जिस्म का मज़ा उठाते हुए ज़रा भी शरम नहीं आई। कैसे उसने मेरी भोली भली बहन को बहका कर उसे इतनी नीच और गिरी हुई बना दिया। और तो और मुझे घर छोड़ने के बहाने नज़ाने कितनी बार उसने मेरी छातियों को अपनी पीठ पर रगड़ा है।

मैं गुस्से से तिलमिला उठी और मन ही मन उससे कोसती हुई घर में दाखिल हुई।

"आ गई बेटा पेपर ख़त्म कर के !" यह मेरी मौसीजी की आवाज़ थी।

"अरे मौसीजी, नमस्ते ! आप कब आई?" मैं एक पल में सारा गुस्सा भूल गई और मेरी मौसीजी के गले से लिपट गई।

बचपन से ही हम दोनों बहनों का हमारी मौसीजी से खूब गहरा प्यार रहा है।

"बस आज ही मैके आई हूँ बेटी। तेरी नानीजी की तबीयत ठीक नहीं रहती तो सोचा उनकी खबर ले आऊँ। अब तुम लोगों के शहर आई हूँ तो अपनी प्यारी भाँजियों से मिले बिना कैसे रह सकती हूँ?" वो बोली।

फिर अगले एक घंटे तक हम बहनें अपनी माँ और मौसी के साथ खूब बातें करते रहे।

अब शाम हो रही थी तो मौसीजी मेरे नानीजी के घर जाने के लिए उठी तो उन्होंने कहा,"अरे तुम दोनों भी मेरे साथ तुम्हारी नानी के घर क्यों नहीं चलती। कल सुबह जब मैं वापिस जाने के लिए बस लूँगी तो तुम दोनों भी अपने घर वापिस आ जाना।"

"नहीं मौसीजी, आज मैं बहुत थक चुकी हूँ। आज ही मेरे पेपर ख़त्म हुए हैं। मैं कुछ दिन आराम करके खुद ही आपके शहर कुछ दिन के लिए आ जाऊँगी" मैं बोली।

"अरे छोटी, तू तो मेरे साथ वहाँ आज की रात रुक सकती है। वैसे भी तो तू मुझे अपनी स्कूटी पर वहाँ छोड़ने जा ही रही है।" मौसीजी ने मेरी छोटी बहन से कहा।

"आ आ ! ठीक है मौसीजी मैं आज आपके साथ वहीं रह जाऊँगी क्योंकि मेरी ट्यूशन शुरू होने वाली हैं, जिस वजह से मैं आपके पास आपके शहर नहीं आ पाऊँगी।" छोटी ने थोड़ा सोच कर कहा।

ट्यूशन का तो सारा उसका बहाना था। असली बात तो मैं जानती थी कि अभी तो वो सिर्फ एक रात के लिए अपने यार, हमारे हरामी मुँह बोले भाई से बिछड़ेगी पर अगर कहीं उसे मौसीजी के शहर जाना पड़ गया तो कई रातों की जुदाई बन जाएगी। मैं एक बार फिर गुस्से से भर गई और इस बार मुझे अपनी बहन पर गुस्सा आ रहा था। उस रात की घटना के बाद मैंने यह खास नोट किया था कि पेपर्स के दौरान जैसे ही मैं रात को पढ़ने के बाद अपने कमरे की लाइट बंद करती थी उसके एक आधे घंटे बाद वो लुच्चा लफंगा दीवार और छतें फांद कर मेरी बहन का बिस्तर गर्म करने उसके कमरे में पहुँच जाता था। हालाँकि उस रात के बाद कभी मैं उन्हे दुबारा यह सब करते देख नहीं पाई क्योंकि फिर कभी ड्रेसिंग रूम का दरवाजा खुला नहीं मिला, पर दरवाजे पर कान लगा कर मैं सब सुन लेती थी। उनकी गरम सरद आहें, सिसकारियाँ और वो छप-छप की आवाज़, और मैं समझ जाती थी कि वो क्या कर रहें हैं। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी बहन जो इतनी भोली बनती है वो इतनी गिरी हुई हरकत कर सकती है, उसे अपने मां-बाप की इज़्ज़त का ज़रा भी ख़याल नहीं आया। यह सब सोच कर मेरा चेहरा गुस्से से लाल हो गया पर मैंने अपने आपको संभाला।

"अच्छा बेटा, अभी मैं चलती हूँ पर तुम कुछ दिन बाद ज़रूर हमारे वहाँ आना !" मेरी मौसीजी जाते जाते बोली।

"जी मौसीजी ज़रूर !" मैं मुस्कुरा कर बोली। और वो दोनों मेरी नानी के घर के लिए रवाना हो गये। कहानी आप मोबाइल से पढ़ना चाहें तो एम.अन्तर्वासना.कॉंम पर पढ़ सकते हैं।

खैर दिन ढला, शाम बीती और रात आई तो मैं टीवी देखने के लिए सोफे पर बैठी तो मुझे अपने नीचे कुछ पड़ा महसूस हुआ। मैंने उठ कर देखा तो पाया कि मेरी बहन अपना मोबाइल घर में ही भूल गई है। मैंने मोबाइल उठाया और उसे मेज पर रख दिया और टीवी देखने लगी। फिर अचानक मेरे दिमाग़ के विचार आया कि क्यों ना मेरी बहन के मोबाइल की तलाशी ली जाए। पता नहीं मैं क्या देखना चाहती थी पर मैंने मोबाइल उठाया, टीवी बंद किया और अपने कमरे में चली गई। रात के तकरीबन दस बज रहे थे और मेरे घरवाले सो रहे थे।

मैं अपने कमरे में गई और अपने बेड पर लाइट कर मोबाइल का लॉक खोलने की कोशिश करने लगी। पर मैं यह पहले भी कई बार ऐसे ही मज़ाक में मेरी बहन के सामने कर चुकी हूँ पर मुझसे कभी लॉक खुला नहीं था और उसने कभी मुझे अनलॉक कोड बताया नहीं था। मैं कुछ देर ट्राई करती रही पर फिर मैं हार कर रुक गई। यह आज मुझसे खुलने वाला नहीं था। फिर अचानक मेरे दिमाग़ में आइडिया आया और मैंने अपने मुँह बोले भाई के नाम के अक्षरों वाले नंबर दबाए और तपाक से फोन खुल गया।

"यस्स !" मेरे मुँह से जीत की खुशी की आवाज़ निकली। लॉक खुलते ही सबसे पहले मैं मोबाइल के इन्बोक्स में पहुँची और मेरी बहन को आए मेसेज पढ़ने लगी। सबसे ज़्यादा मेसेज उस हरामी के ही थे।

और मेसेज थे इतने लुच्चे कि कुछ को पढ़ कर तो मैं भी शर्म से पानी पानी हो गई। एक मेसेज जो बार बार आया था वो था,"सब सो गये क्या मेरी जान? मैं आ जाऊ क्या?"

मैं मन ही मन उस आवारा, घटिया इंसान को कोसने से ना रह सकी। उसके बाद मैंने मोबाइल का आउटबॉक्स देखा तो मेरी प्यारी भोली भाली बहन के लिखे हुए बद से भी बदतर घटिया चीप और लुच्चे मेसेज पढ़ कर मैं भी शरम से पानी पानी हो गई।

एक मेसेज था,"जल्दी से आ जाओ मेरी जान, मैं मारे प्यार के मरी जा रही हूँ। मैंने ब्रा और पेंटी भी नहीं पहनी है ताकि तुम्हे ज़्यादा कपड़े ना उतारने पड़े। जल्दी आ जाओ अब अपनी जानू के पास। और कहो तो जो बाकी कपड़े पहने हैं वो भी उतार दूँ क्या। जल्दी आ जाओ वरना मैं दीवार फांद कर मोहल्ले के चौकीदार से चुदने चली जाऊँगी।

छीः ! इतना गंदा मेसेज। इससे आगे तो मैं भी ना पढ़ पाई। खैर, अभी मैं मेसेज पढ़ ही रही थी के अचानक उसके मोबाइल पर एकदम से एक मेसेज आया और मैं डर के मारे कांप गई और मोबाइल मेरे हाथ से छूट कर नीचे गिर गया। मेरी साँस फूल गई, मानो मुझे क़िसी ने चोरी करते पकड़ लिया हो। मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। फिर कुछ पल बाद मैंने अपने आपको संभाला और स्टडी टेबल पर पड़ा पानी पिया। थोड़ी साँस ठीक हुई तो कुछ हिम्मत कर के मैंने वो मेसेज पढ़ा।

"सब सो गये क्या जान? बोलो तो अभी आ जाऊँ !" ये हमारे उस लफंगे मुँह बोले भाई का मेसेज था।

शायद मेरी बहन ने उससे बताया नहीं था कि वो आज घर पर नहीं है। बताती भी कैसे, उसका मोबाइल घर पर है, मौसीजी के पास मोबाइल नहीं है और हमारे नानीजी के घर का फोन कल से डेड पड़ा था जो आज भी चालू नहीं हुआ था। मेरे दिमाग़ में एकदम से पता नहीं क्या आया और मैंने तपाक से उसके आउट बॉक्स में से एक मेसेज," अभी थोड़ा रुकना जान। दीदी अभी जाग रही हैं। थोड़ी देर में आना।" उस लफंगे को सेंड कर दिया।

यह मैंने क्या किया? मेसेज सेंड करते ही मैं घबरा गई मेरे होश उड़ गये। मैंने ऐसा क्यों किया? पता नहीं कहाँ से मेरे मन में ये ख़याल आ गया था कि आज इसे मैं घर में बुलाती हूँ और जैसे ही वो मेरी बहन के कमरे में घुसेगा मैं उसे तपाक से एक तमाचा मारूँगी और बत्ती जलाकर उसे बताऊँगी कि यह मेरी बहन नहीं मैं हूँ और उसे खबरदार करूँगी कि आइन्दा अगर उसने ऐसी कोई घटिया हरकत की तो मैं उसकी करतूतों की खबर हमारे और उसके घरवालों को दे दूँगी।

यह सोच कर मैं कुछ संभली और मोबाइल साइड में रखा और अपने आप को संभालने के लिए और कपड़े बदलने के लिए ड्रेसिंग रूम में गई। ड्रेसिंग रूम की लाइट जला कर मैंने अपने आप को शीशे में देखा।

मैं मेरी बहन की तरह ही गोरी चिट्टी और सुंदर लड़की हूँ। जब भी बन ठन कर क़िसी शादी मैं जाती हूँ तो मेरी उमर से छोटे लड़कों से लेकर मैंने बूढ़े बूढ़े लोगों को नज़रों नज़रों में मेरे कपड़े उतारते महसूस किया है। हमारे सब रिश्तेदार तो यह भी कहते हैं कि बड़ी छोटी से ज़्यादा सुशील ही नहीं बल्कि सुंदर भी है। अपनी सुंदरता छुपाने के लिए मैं जानबूझ कर चश्मे लगाती हूँ ताकि लड़के मुझे तंग ना करें। पर फिर भी बहुत सारे लड़के मेरे साथ बात करने को उतावले रहते हैं।

अरे, एक दो बार तो कॉलेज जाते समय मुझे स्कूल के कुछ लड़कों ने भी बस में छेड़ा है। ऐसी पिटाई की थी मैंने उन लड़कों की अब तक उस बस में सफ़र नहीं करते जिसमें मैं बैठी होती हूँ।

कहानी जारी रहेगी।

प्रकाशित: मंगलवार 18 सितंबर 2012 6:58 am

 

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