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वो हसीन पल

प्रेषक : अक्षिता शर्मा एवं जो हन्टर

हाय, मैं अक्षिता, फिर से आपके लिये अपनी जिंदगी का एक हसीन पल लेकर उपस्थित हुई हूँ, मेरी प्रथम कहानी के लिये मुझे आपका बहुत ढेर सारा प्यारा मिला, सभी को अलग अलग जवाब देने के लिये मेरे पास समय भी कम पड़ गया। आप सभी को को मेरा दिल से प्यार और धन्यवाद।

आइए, आपको अभी ही 3 अक्टूबर 2009 की सच्ची बात बताती हूँ।

2 अक्टूबर 2009 को मेरे पति के ऑफ़िस की गांधी जयन्ती की छुट्टी थी, पर काम के सिलसिले में उन्हें आज बाहर जाना था ताकि अगले दिन वो बैठक में भाग ले सकें। आप जानते ही हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है, मेरे सेक्सी दिमाग ने एक दम से ही एक योजना बना डाली। मैंने अपने बॉय-फ़्रेण्ड कुलदीप को फोन कर दिया। मैंने नीता से भी कहा, पर डर के मारे उसने कुछ नहीं कहा।

कुलदीप समय पर आ गया था। हम दोनों शाम को बाज़ार घूमने निकल पड़े। वहां कुलदीप ने मेरे लिये ब्रा और एक छोटी सी प्यारी पेण्टी ली। मैंने भी उसके लिये एक बढ़िया सा अंडरवियर लिया। इसका सीधा सा मतलब था कि हमें रात की चुदाई में ये सब ही पहनना है। यही हमारी दिवाली का तोहफ़ा भी था।

रात ढलते ढलते हम घर आ चुके थे।

रात को जब मैं खाना बना रही थी तो कुलदीप अपने घर जाकर जाने कब लौट आया। नीता को उसके आने के बारे में पता नहीं था। नीता मुझसे कुलदीप के बारे में ही पूछ रही थी कि हम दोनों ने क्या क्या मजे किये ?

मुझे लगा कि उसकी चूत भी यह सोच सोच कर गीली हो रही थी कि मैंने लण्ड कैसे लेती हूँ, वगैरह।

मैंने उसे बताया कि यदि मैं बताऊंगी तो फिर अपने आप को रोक नहीं पाऊंगी।

"अरे वाह, ऐसा क्या किया था तुम दोनों ने ? बता ना दीदी?"

"अच्छा तू अपना काम खतम कर फिर बताऊंगी तुझे !"

हम दोनों ने फ़टाफ़ट अपना अपना काम समाप्त किया ... तभी मेरे मन एक प्यारा सा ख्याल आया कि क्यों ना नीता मेरे साथ मिलकर रात को चुदाई का मजा ले। मैंने नीता को कहा,"देख बात तो बहुत लम्बी है ... रात को मेरे साथ ही सो जाना ... मैं पूरी कहानी बता दूंगी !"

"हाय नहीं रे दीदी, तू कुछ ना कुछ गड़बड़ जरूर करेगी, मुझे तो शरम आयेगी !"

"तुझे सुनना है तो बोल वरना तेरी मर्जी ..."

ये सब बातें कुलदीप सुन रहा था, उसे लगा कि आज रात की चुदाई तो गई, पर उसे क्या पता था था कि मैं उसी के लिये तो नई चूत का इन्तज़ाम कर रही हूँ ! और नीता के लिये एक सोलिड नया लण्ड तैयार कर रही हूँ। नीता ने कुछ सोच कर कहा कि मुझे पूछना पड़ेगा उन्होने हां कह दी तो मैं अभी आ जाती हूँ।

जैसे ही नीता जाने लगी तो मैंने उसे पीछे से आ कर उसकी कमर को पकड़ कर अपने से चिपका लिया और उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ दबा दी ... और उत्तेजना में मसल दी ...

"उफ़्फ़्फ़्फ़, दीदी ... हाय रे ..." और वो हंस पड़ी

"सॉरी, नीता ... जल्दी आना ... मैं इन्तज़ार करूंगी" और हंस कर आंख मार दी।

"दीदी ... अब तो बड़ी बेशरम हो गई है तू ... अभी आती हूँ ..." नीता चली गई।

बैचेन सा कुल्दीप बाहर आया और असमन्जस में बोला,"अक्षी, आज की चुदाई का क्या होगा ...?"

"क्यों ... क्या हुआ ... तेरा लण्ड तो मस्त है ना ... या कुछ ...?"

"ओह्ह हो ... तुमने नीता को बुलाया है ना ...?"

"मेरे जानू, आज मैं तुम्हें वो मजा दूंगी कि हमेशा याद करोगे, बस अब देखते जाओ !"

कुलदीप के मुख पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट तैरने लगी, शायद उसे कुछ अंदाज़ा हो गया था। खाना बनाने के बाद मैं बैठक में आ गई। कुलदीप नहाने चला गया ... कुछ ही देर में बाथरूम से उसने आवाज दी,"अक्सू, जरा यहाँ आना ...!"

मैं बाथरूम के पास गई और दरवाजा खोला। उसे देखकर मैं सन्न रह गई, वो पूरा नंगा था ... उसका मोटा और भारी लण्ड कड़क होकर सीधा तना हुआ था। मेरे मन में हलचल होने लगी। दिल धड़क उठा। उसे मैंने यों पहली बार देखा था। उसका नंगा और चिकना बदन, उस पर पानी की बूंदें उसे बला का सेक्सी बना रहा था। मेरे मन में वासना का उबाल आने लगा। मेरे चुचूक अकड़ गये, चूत से पानी रिसने लगा। वो खड़े खड़े अपना लण्ड हिला रहा था, उसका लाल सुपारा गजब ढा रहा था। मैं शर्माती हुई अन्दर चली आई, उसने मुझे आँख मार दी, मेरी नजरें झुक गई और मैंने धीरे से उसका फ़ड़फ़ड़ाता हुआ लौड़ा अपने हाथों में भर लिया।

"मेरी पीठ पर साबुन लगा दे ... जरा रगड़ कर ..." मैं उसकी पीठ पर साबुन मलने लगी, साथ ही साथ अपना हाथ उसके कड़े चूतड़ो पर भी फ़िसलने लगा।

उसके चूतड़ों की गहराई में हाथ घुस कर उसे मजे दे रहा था। दूसरे हाथ से मैंने उसकी चौड़ी छाती पर उसके जरा से निपल को मसलने लगी। मैंने उसकी छाती पर अपना सर रख दिया और साबुन वाले हाथ नीचे लण्ड पर उतर आये। उसके लण्ड पर साबुन मलते हुये उसका जैसे मुठ ही मारने लगी। कुलदीप ने अपनी आंखें बन्द कर ली ... और उसके गीले हाथ मेरे उन्नत वक्ष पर आ गये। कुछ ही देर में उसने मेरी चूचियाँ बाहर निकाल ली और एक दूसरे को मसला-मसली का दौर चल पड़ा। उसका पूरा शरीर साबुन के झाग से ढक गया था। जाने कब हम दोनों के होंठ आपस में जुड़ गये ... सच में बहुत आनन्द आ रहा था ... स्वर्ग जैसा आनन्द ... ।

लण्ड की घिसाई से वो बहुत आनन्दित हो रहा था। तभी उसने मुझे खींच कर शॉवर के नीचे कर लिया और पानी बरसा दिया। मेरे कपड़े भीग उठे, मेरे चिकने स्तन पानी से भीगे हुये थे। एकदम फ़ूल कर कड़े हो गये थे। मेरे गीले बदन को भोगने की नजर से देखने लगा ... मैं समझ गई थी कि अब उसका लण्ड मुझे चोदने के लिये तैयार है। मेरे हाथ उसके लण्ड पर तेजी से मुठ मार रहे थे। उसने मेरे रहे सहे कपड़े भी उतार दिये। मेरी आंखों में नशा सा छा गया। वो मुझे बेहद सेक्सी लगने लगा था। चुदने को चूत लपलपाने लगी थी। मुझे एक झुरझुरी सी आई और मैं उससे एक दम चिपक गई। हमारे अधर एक दूसरे को पी रहे थे ...

चूसने की आवाज यूं आ रही थी मानो आम चूस रहे हों ... क्या रस भरा महौल था ...

मेरा अंग अंग मसले जाने को बेताब हो रहा था। उसका लण्ड अब भी मेरी मुठ्ठी में था। उसने मेरे निपल को दांतो से काट सा लिया ... मेरी चूत पर जैसे आग में घी के जैसा असर होने लगा। चूत में आग सी लग गई,"दीपूऽऽऽऽ अह्ह्ह् ... मार डाला रे तूने तो ..."

"मेरी रानी ... तेरे अंग बहुत मद भरे हैं ... आह्ह्ह्ह"

मुझसे रहा नहीं जा रहा था। इसका सुन्दर, मोहक लण्ड मेरे दिल को पिघला रहा था। अनजाने में मैं नीचे बैठती गई और अब उसका मनमोहना सुन्दर लण्ड मेरे होंठो के पास था। मैंने उसका लाल तड़पता हुआ सुपारा अपने मुख में भर लिया और चूसने और काटने लगी।

"हाय रे ... मेरा लण्ड काट कर खा मत जाना ... श्स्स्स्स्स्स्स् ... निकल जायेगा रानी" उसकी सिसकी फ़ूट पड़ी। मैं अब जल्दी जल्दी उसके लण्ड को अपने मुख में अन्दर बाहर करने लगी, उसका लण्ड बुरी तरह से फ़ड़फ़ड़ा रहा था। वो भी झुक कर मेरे स्तनों को मरोड़ने और खींचने लगा। उसने मुझे अब प्यार से उठाया और खड़ा कर दिया। उसने मेरे मस्तक पर चूमा, फिर मेरे होंठो को, मेरे कंधे पर, फिर मेरे उरोज पर, नाभी पर ... हाय राम ...

वो तो मेरी चूत तक पहुंच गया। उसके होंठ मेरी गीली और चिकनी चूत के लबों में पहुंच कर उस रस का स्वाद लेने लगे ... मेरी चूत की चिकनाई में वासना से भरे बुलबुले भी उभर आये थे, जैसे चूत में रस का मन्थन हो रहा हो। मेरा वो पहला प्यार था, उसके लिये मैं सब कुछ कर सकती थी ... मेरे मन भी चूत चुसवाने को मचल रहा था। दिल को दिल से रहत होती है ... वो मेरी अदायें समझता था। मेरी टांग अपने आप एक तरफ़ उठ गई और मेरी चूत का मुख खुल गया उसकी जीभ मेरी चूत के अन्दर तक चाट रही थी। दाना फूल कर लाल हो गया था। बार बार होंठो से चुसने के कारण मेरे तन की आग भड़कने लगी थी।

मैंने उससे कहा,"कुलदीप मुझे तेरा लण्ड चूसना है ... बड़ा ही मस्त है रे ..."

वो मुस्करा उठा और वहीं बाथरूम में सीधा लेट गया। वो जब मेरी चूत चूसता है तो मेरा मन करता है कि मैं अलादीन का चिराग बन जाऊँ और जो वो मांगे दे दूं।

मैं कुलदीप पर उल्टा लेट गई। हम अब 69 पोजीशन में थे। वो मेरी चूत के रस का स्वाद ले रहा था और मैं उसके मोटे और सुन्दर लण्ड को बड़े प्यार से चूस रही थी, कभी कभी काट भी लेती थी और फिर उसके सुपारे के छल्ले को कस कर और खींच कर चूस लेती थी। मेरे अंगों में तरावट सी आने लगी ... जिस्म कंपकंपाने सा लगा ... एक मीठी सी लहर उठने लगी ...

"दीपू ... मेरा पानी निकल जायेगा ... हे मेरी मां ... कैसा कैसा हो रहा है ..."

"मेरी प्यारी अक्सू ... निकाल दे पानी ... तू मेरा रस पी सकती है तो क्या मैं तेरा रसपान नहीं कर सकता ...?"

मैं अपनी उच्चतम सीमा को पार करने ही वाली थी ... कि उसने चूसने की स्पीड बढ़ा दी और अपनी जीभ और दो अंगुलियाँ मेरी चूत में समा दी। मैं लहरा उठी और मेरी चूत उसके मुँह से भिंच गई और आग उगलने लगी ... पानी छूट गया ... मैं झड़ने लगी ...।

अब मेरी बारी थी, मैंने उससे कहा कि अब अपना वीर्य भी मुझ पिलाओ ...

उसने प्यार से मुझे सहला कर मुझे बैठा दिया और स्वयं अपना लण्ड मेरे सामने ले कर खड़ा हो गया।

"जानू आज अपने चेहरे को मेरे वीर्य से भिगा दो ... मैं अपना ही माल चाट कर देखूंगा !"

मैंने उसका लण्ड मुख में भर लिया और अपने हाथों की ताकत का इस्तमाल किया, कस-कस के मुठ मारने लगी। वो तड़प सा गया। उसका जिस्म लहराने लगा, उसके अंगों में बिजलियाँ दौड़ने लगी। उसने छटपटा कर मेरे मुख से लण्ड निकाल लिया और एक भरपूर मुठ मार कर निशाना बांध लिया। एक तेज वीर्य की धार निकल पड़ी और निकलती ही गई ... मेरा पूरा चेहरा जैसे नहा लिया हो ... कुछ तो मैंने अपने मुँह में भर लिया पर दूसरे ही पल में कुलदीप मेरे चेहरे पर लपक कर आ गया और अपना ही वीर्य चाटने लगा। उसकी जीभ मेरे चेहरे को गुदगुदाने लगी, मुझे बहुत ही आनन्द आया। मैं खड़ी हो गई, कुलदीप को मेरे चेहरे को भरपूर चाटने को मिल गया था। अभी भी वो मुझे चाट कम रहा था चुम्मा अधिक ले रहा था।

मैंने प्यार में भर कर उसे चिपका लिया और उसकी गर्दन में बाहें डाल कर झूल गई।

कुछ ही देर हम दोनों बाथरूम से बाहर आ गये और मैं अपने कपड़े उठाने लगी।

कुलदीप ने मुझे रोक लिया और कहा,"जानू हमरे बीच में कोई परदा तो नहीं है फिर कपड़ों की क्या जरूरत है, आज ऐसे ही , नंगे ही हम केन्डल लाईट डिनर करेंगे !"

मैं शरमा गई, हाय ऐसे कैसे नंगे होकर हम खाना खायेंगे। अपना गीला बदन लिये हुये मैं अपने बेड रूम में आ गई और आईने के सामने अपने आपको निहारने लगी। मैंने ऊपर एक झीना सा गाऊन डाल लिया। मैं आईने में अपना ही अक्स देख कर शर्माने लगी। सच में बहुत सेक्सी बदन थ मेरा ... मेरी उभरी हुई चूचियाँ फिर उस पर पानी बूंदें ... कोई भी मुझे चोदने को लालायित हो सकता था।

मैंने अपना गाऊन अपने शरीर पर कस कर लपेट लिया। बदन गीला होने से मेरी गीली चूचियाँ बाहर से ही अपना नजारा दिखाने लग गई थी। मैंने अपना सर झटका ...

हाय मैं ये क्या सोचने लग गई। मेरे गीले बदन से गाऊन चिपक गया था। मैंने गाऊन उतारा और नंगी ही बैठक में आ गई। कुलदीप सोफ़े पर लेटा सुस्ता रहा था ... उसका लण्ड मुरझाया हुआ था। मुझे देखते ही उसने मुझे अपनी तरफ़ बुलाया।

मैं जैसे ही उसके पास गई उसने मुझे अपने ऊपर गिरा लिया। उसका लण्ड फिर से खड़ा होने के लिये फ़ुफ़कार उठा। मैंने नजाकत देखते हुये उसके लण्ड को थाम लिया और उसके होंठो से होंठ मिला दिये। मुझे इस तरह नंगी घूमते देख कर वो एक बार फिर से भड़क गया।

"चलो हटो ना ... अब खाना खा लें ..."

कुलदीप ने मुझे छोड़ दिया।

तभी दरवाजे की घण्टी बजी। हम दोनों घबरा से गए।

"कौन है ...?"

"मैं नीता ..."

रात बहुत हो चुकी थी।

"रुको जरा मैं आई ..."

मैंने तुरंत ही कुछ सोच लिया और कुलदीप को बाथरूम में भेज दिया। मुझे नीता को हीट में जो लाना था।

"नीता साथ में और कौन है? रात में रुकेगी ना?"

"अरे बाबा, दरवाजा तो खोल, मेरे साथ कोई नहीं है ... तेरे पास ही तो आई हूँ !"

मैंने धीरे से दरवाजा खोला और यहाँ-वहाँ झांक कर देखा। कोई भी नहीं था, तब मैंने उसे अन्दर खींच लिया। मुझे पूरी नंगी देख कर वो चौंक गई। उसने पहली बार मुझे नंगी देखा था।

"ये क्या अक्सू ..."

"अभी नहा कर निकली थी कि तू आ गई ... इसलिये ऐसे ही आ गई !"

"आह्ह रे अक्सू ... तू भी ना ऽऽ"

"देख मैं अच्छी लगती हूँ ना, मेरे ये सब देख ... और बता ..."

वो झेंप गई और शरमा गई ...

"दीदी ...बस है ना ... ओह दीदी ... आप तो बला की सुन्दर हैं !"

"चल, आज मौका है ... तुझे एक सेक्सी बात जाननी थी ना ... आज तुझे लाईव दिखा दूँ !"

"मैं समझी नहीं दीदी ... क्या दिखाओगी ...?"

"सब कुछ समझ जाओगी ... देखो शर्माओ मत ... बता भी दो अब ..."

वो शर्मा उठी और मुस्कराते हुये धीरे से हां में सर हिला दिया। वो सब कुछ समझ चुकी थी कि मैं उसके साथ कुछ करने वाली हूँ। वो कुछ ऐसे ही विचार में डूबने सी लगी उसके मन में वासना का गुबार उठने लगा।

मैंने उसे कहा कि वो मेरे बेडरुम में चली जाये और चुपके से बिना आवाज के दरवाजे से झांक कर देखते रहना। वो कुछ असमन्जस में उठी और बेडरूम में चली गई।

मैंने कुलदीप को बाथ से बुला लिया ... वो कुछ आश्चर्य से बोला,"तुम ऐसे ही उसके सामने चली गई ... नंगी ... वो गई क्या?"

"अरे वो मेरी पड़ोसन है ... गई वो तो ... चलो खाना खा लें ..."

हम नंगे ही खाना खाने बैठ गये। खाना खाते समय वो मेरे स्तन दबा देता था, चुचूकों को ऐंठ देता था। मैं भी उसका लण्ड सहला देती थी। उसका भी खड़े लण्ड के साथ खाना मुश्किल हो रहा था। हमारी ये सब मस्ती नीता देख रही थी। मैं नीता को बार बार आँख मार रही थी। नीता भी ये सब देख कर उत्तेजित हो रही थी। कुलदीप ने एक ब्ल्यू फ़िल्म की सीडी निकाली और उसे लगा दी। पहले ही सीन में दो लड़कियां एक लड़के से चुदवा रही थी।

"कुलदीप, तुम्हारा मन एक साथ दो चूतों को चोदने का नहीं करता ?"

वो शरमा गया "अरे नहीं, तू ये क्या कह रही है ..."

"अरे बता ना ... बेचारा लण्ड तो कुछ कहेगा नहीं ..."

"देख बुरा मत मान लेना ... दो चूत चोदने का किसका मन नहीं करेगा ... फिर एक साथ दो लड़कियाँ क्युँ चुदवायेगी, खैर ! मेरे ऐसे नसीब कहाँ ..."

"अच्छा ... मेरे साथ तुम्हें चोदने को दो चूत मिल जायें तो ...?"

नीता सब सुन रही थी और उसे शायद ये मालूम हो गया था कि दूसरी चूत उसी की होगी।

पहले तो वो मना करता रहा पर मैंने उसे मना ही लिया। नीता अपने होंठों पर जीभ फ़िरा रही थी और अब अपने होंठ काटने लगी थी। उसकी चूत में रस चूने लग गया था।

मैं नीता को उत्तेजित करने के लिये कुलदीप का लण्ड पकड़ कर उसे हिलाने लगी। उसका लण्ड मस्ती से झूमने लगा। कड़क हो उठा ... नीता अपनी बड़ी बड़ी आंखों से उसे बड़े मोहक तरीके से निहार रही थी। मैं नीता को आंख मार कर मुस्करा रही थी। मैंने उसकी आंखों में उत्तेजना देखी और उसे इशारा किया लण्ड पकड़ने के लिये। उसने जल्दी से सर हिला कर मना किया। फिर मैंने उसे लण्ड मुँह में लेने का इशारा किया। वो शरमा कर हंस दी ... यानी कि हंसी और फ़ंसी। मैं समझ गई उसे ये सब पसन्द है। मैंने कुलदीप का लण्ड मुँह में लिया और चूसने लगी और उसे देखने लगी। फिर मैं अपनी अंगुली अपनी चूत में डाल कर हिलाने लगी।

वो उत्तेजना से बेहाल थी। मैंने उसे फिर इशारा किया कि वो बाहर आ जाये।

उसने शर्म के मारे फिर ना कर दिया। मुझे लगा कि उसे समझाना पड़ेगा। मैं अन्दर गई और उससे कहा तो बोली कि शर्म आती है। मैंने उसके बोबे दबाये और कहा,"क्यूँ ! मन चुदने का नहीं हो रहा है क्या ?"

उसका शर्माना उसकी हां कह रहा था। वो शरमा कर नीचे देखने लगी। उसने धीरे से सर हिला कर हां कहा। पर फिर कहा कि वो मुझे देख लेगा तो। मैंने उसे स्कीम बताई, मैं लाईट बन्द करके अंधेरा कर दूंगी फिर जब मैं घोड़ी बनूं तो मैं उसे तेरे पास ले आऊंगी वो तुझे चोद देगा।

कुछ भी ना बोलना और हां वो लण्ड मेरा है, उसे हाथ भी मत लगाना। यह कह कर दोनों ही हंस पड़ी।

मैं वापस आकर उसके लण्ड से खेलने लगी और वो मेरे चुचूकों से खेलने लगा। फिर एक हाथ मेरी चूत पर रख कर उसे रगड़ने लगा। फिर चूत में अंगुली डाल कर अन्दर-बाहर करने लगा। उसका लण्ड मेरी चूत को मिसकॉल मारने लगा। मैं सोफ़े पर झुक गई और वो मेरी चूत खोलकर उसे चाटने लगा। मैं सिसकियाँ भरने लगी।

नीता सिसक उठी, मेरी नजरें उसी पर थी। कुलदीप ने अपना पूरा लण्ड चूत में घुसा दिया। मेरे मुख से उफ़्फ़्फ़्फ़ निकल गई। उसके लण्ड को चूत में से निकाल कर मैंने उसे अपने मुख में भर लिया और चूसने लगी। वो तड़प उठा और बोला,"अक्सू ... आज तो अपनी गाण्ड प्यारी के दर्शन करा दे ..."

मुझे भी बहुत समय हो गया था गाण्ड मरवाये सो मैंने भी लण्ड को गाण्ड का रास्ता दिखा दिया।

गाण्ड गीली होने से उसका लण्ड सट से छेद में घुस पड़ा। कुलदीप बोला,"अरे चूत इतनी टाईट कैसे हो गई?"

मैं हंस पड़ी। उसे मालूम था या वो अन्जान बन रहा था।

"सुनो जनाब, आपका लौड़ा मेरी गाण्ड में है, तुम्हें पता ही नहीं चला कि लौड़ा तुमने किस छेद में डाला?"

यह सुन कर वो खुश हो गया। मैं गाण्ड चुदाने के नशे में डूब गई। तभी मुझे नीता का ध्यान आया। मैंने घूम कर उसे देखा तो वो अपनी चूत दबा कर सिसकियाँ भर रही थी।

मैंने कुलदीप को देखा वो मस्ती में मेरी गाण्ड चोदे जा रहा था।

"सुनो बेड रूम में चलो, तुम्हें एक सरप्राईज देना है !"

" हाय, वो सब बाद में ! पहले पानी तो निकाल दूं !"

"नहीं, पहले आओ तो ... चलो ...!" मैं उसे धकेलते हुये बेडरूम में ले आई। तभी उसे नीता की एक झलक मिली, नीता तुरन्त ही परदे के पीछे छिप गई। उसे लगा कि शायद उसे भ्रम हुआ है। वो बिस्तर पर लेट गया। मैं उसके ऊपर लेट गई और उसकी आंखों पर अपनी चुन्नी बांध दी।

"अब रुको, मैं अभी आई ..." मैंने लाईट बन्द कर दी। मैंने नीता को बुलाया और उसे सब समझा दिया। नीता ने उसके खड़े लण्ड को धीरे से अपने मुँह में ले लिया। पर उसकी स्टाईल अलग थी ... उसका तरीका अलग था।

"जल्दी कस कर चूसो ना ..." मैंने नीता को इशारा किया। उसने लण्ड मसलते हुए जोर से चूसने लगी। फिर भी उसमे मेरी वाली बात नहीं आ रही थी। पर नीता को तो मस्ती चढ़ने लगी थी। उसकी आंखें बंद हो चली थी। यह देख कर मैंने लाईट जला दी। लाईट जलते ही नीता ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने इशारा किया ... चूसे जाओ ...

मैंने नीता के पूरे कपड़े उतार दिये और उसे पूरी नंगी कर दिया। मैंने जोश में उसकी चिकनी चूत में अंगुली डाल दी, वाह क्या चूत थी उसकी ...बहुत ही प्यारी सी, चिकनी ... गुलाबी उसमें काम-रस भरा हुआ। मैंने उसकी उसकी चूत में अपने होंठ चिपका दिए और उसकी रस भरी चूत का पान करने लगी।

"बस, अक्सू ... अब चूत में लण्ड डाल दो ..." मैंने नीता को इशारा किया तो वो उठ कर उसके लण्ड पर बैठ गई। उसका लण्ड नीता की चूत में घूत में घुसने लगा।

"आज क्या हो गया है ... तुम्हारी चूत तो अलग सी लग रही है ?"

नीता के चेहरे पर शर्म की लालिमा तैर गई। मैंने जवाब दिया,"अच्छा मजाक कर लेते हो ... जरा लौड़े का कमाल तो दिखाओ !"

नीता शरमाते हुये अपनी चूत ऊपर नीचे करने लगी और बड़े प्यार से चुदने लगी।

मैं भी कुलदीप के दोनों और टांगें करके खड़ी हो गई और अपनी चूत नीता के मुख से सटा दी। नीता चुदते हुये मेरी चूत चूसने लगी। बड़ी खूबसूरत चुदाई चल रही थी। नीता अब सम्पूर्णता की ओर बढ़ने लगी थी। उसने धीरे से कहा,"दीदी, मैं तो आह्ह्ह गई ..."

"रुक जा तू धीरे से उठ जा " मैं अब कुलदीप के लण्ड पर चढ़ गई और लण्ड पूरा घुसा लिया। नीता को सामने खड़ी कर लिया और उसकी चूत में दो अंगुलियाँ डाल कर उसकी चूत चोदने लगी। वो झड़ने लगी ... उसका पानी निकल गया। वो शांत हो गई। अब नीता धीरे से वहां से हट गई। मैं घोड़ी बन गई और कुल्दीप मेरी चूत चोदने लगा। मेरी चूत अब रिसने लगी थी। मैं आनन्द से सराबोर हो चुकी थी।

मैं भी अब झड़ने के कगार पर थी। मजे लेते लेते मन कर रहा था कि कभी ना झड़ूँ ...

पर आखिर में मेरा पानी छूट ही गया। मैंने जल्दी से उठ कर अपनी चूत कुलदीप के मुख से सटा दी ... उसने मेरे रस का स्वाद लिया और जोर से चूत को चूसने लगा। मैं चूत चुसाने के बाद उल्टी हो कर उसके खड़े लण्ड का वीर्य निकालने के लिए उसे चूसने लगी। नीता की जीभ भी लपालपा उठी, मैंने नीता को पूरा मौका दिया चूसने का। कुलदीप कुछ ही देर में नीता के मुख में ही झड़ गया। नीता को थोड़ा अजीब लगा पर मैंने उसे पूरा पी जाने कहा। उसने पूरा लण्ड साफ़ किया और उठ कर बाहर चली गई। मैंने कुलदीप से कहा कि मैं अभी मुँह साफ़ करके आती हूँ ...

उसकी आंखों से मैंने अपनी चुन्नी खोल दी। कुलदीप मन्द-मन्द मुस्करा रहा था।

मैं बाहर आई तो नीता का चिकना सुघड़ शरीर देख कर दंग रह गई। मैंने उसकी कमर पकड़ कर उसकी चूत में अंगुली डाल दी। वो हंस पड़ी। फिर उसे हटते ही मैंने अपना मुख भी साफ़ कर लिया। नीता सोफ़े पर चादर डाल कर सो गई। मैं भी भीतर जाकर कुलदीप का लण्ड पकड़ कर सो गई।

सवेरे उठते ही मुझे झटका लगा। कुलदीप मेरे साथ नहीं था। मैंने धीरे से उठ कर परदे से झांका तो वो नंगा खड़ा था और नीता के नंगे बदन को देख कर मुठ मार रहा था। नीता की चादर नीचे गिर गई थी। मैंने धीरे से जाकर कुलदीप का हाथ लण्ड से छुड़ाया और बताया कि वो रात उससे चुद चुकी है। उसे कहा कि अब देर किस बात की है ... अब खुल कर चोद डालो ...

कुलदीप ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से उसके पास आ गया और उसकी चूत पर अपना लण्ड लगा दिया। थोड़ा सा जोर लगाते ही वो अन्दर उतर गया।

नीता जाग गई ... और कुलदीप को अपने ऊपर पा कर जैसे धन्य हो गई। उसके हाथ कुलदीप की कमर पर लिपट गये, दोनों एक होने के लिये मचल पड़े। उसकी नजर ज्योंही मुझ पर पड़ी ... वो सब कुछ समझ गई। मुझे आंखों ही आंखों में धन्यवाद कहा और अपनी आंखें बंद कर ली ... नीता की शरम अब जा चुकी थी ... उसने अपनी टांगें ऊपर कर ली और कुलदीप का एक नया सफ़र आरम्भ हो गया।

मैंने ईश्वर को अपनी इस सफ़लता पर धन्यवाद किया। और रोज़मर्रा के कार्य पर लग गई। आज तो चुदाई का आगाज था ... आगे जो चुदाई होनी थी, उसे सोच सोच कर नीता बेहाल हुई जा रही थी।

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प्रकाशित: मंगलवार 16 अगस्त 2011 11:53 pm

 

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