अंतिम नवीकरण : ०२ सितम्बर, २०१०
कुल कहानियाँ : १३९३
प्रेषक : पुनीत
दोस्तों बात आज से करीब ३ साल पहले की है।
मेरी उमर उस वक़्त २२ साल थी।
फिल्मों में तो कई बार नंगी लड़कियों और औरतों को देखा था लेकिन आँखों के सामने प्रत्यक्ष नही।
एक बार की बात है कि मुझे एक परीक्षा देने नैनीताल जाना था और वहाँ मुझे पूरे एक सप्ताह रहना था।
एक रिश्ते की आंटी का पता चला तो मैं उनके घर चला गया।
आंटी अपने दो बच्चे के साथ रहती हैं।
अंकल अरब-देश में नौकरी के सिलसिले में गए हुए हैं।
हम सब एक ही बिस्तर में सोए हुए थे।
आँटी बेड के एक ओर, मैं दूसरे किनारे पर और बीच में बच्चे सोए हुए थे।
अचनक नींद में आंटी के वक्ष पर मेरा हाथ लग गया।
मेरी तो घंटी बज गई।
आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
और मैंने डर के मारे हाथ हटा लिया।
अगले दिन मैं पढ़ रहा था।
बच्चे स्कूल जा चुके थे।
आंटी मेरे पास आई और पूछा- कल क्या हुआ था?
शायद आंटी का मन बन चुका था कुछ करने-कराने का !
उनकी उमर यही कोई ३४ साल होगी।
मैंने कहा- गलती से लग गया था, सॉरी !
वो हंसने लगी और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर अपने स्तनों पर रख दिया।
बस फ़िर तो डर ही क्या था, मैंने भी आंटी के बूब्स पर कपड़ों के बाहर से हाथ फिराना शुरू कर दिया।
धीरे धीरे हुक खोले, ब्रा निकली और चूसने लगा बूब्स को !
हम दोनों के कपड़े निकल चुके थे।
मैंने उनकी पूरी बॉडी को किस करना शुरू किया।
और मेरा लण्ड अब तन चुका था।
मैंने देर नहीं की !
अंदर डालने की कोशिश की मगर मेरा मोटा लण्ड अन्दर जा ही नहीं रहा था।
मैं भी घबराया सा था।
आंटी ने मेरे लण्ड को अपने हाथ में पकड़ कर अपनी योनि के द्वार पर सटा लिया और कहा- अब मारो धक्का !
मेरा लौड़ा सीधा अंदर चला गया और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कि किसी शिन्कजे ने मेरे लण्ड को जकड़ लिया हो।
आंटी को चुदे हुए भी करीब एक साल हो गया था।
एक साल से, जैसे हम मूठ मारते हैं, आंटी हाथ से ऐसे ही करती थी।
वो दर्द के मारे तड़फ़ने लगी !
और दोस्तों मुझे भी बहुत दर्द हो रहा था- लण्ड का मांस ऊपर खिंच रहा था !
लेकिन मज़ा भी आ रहा था !
उस दिन मैंने आंटी को पाँच बार चोदा।
बस फिर क्या था- एक हफ्ते तक रोज़ रात को भी और दिन को चोदता मैं आँटी को !
दूसरे ही दिन मैंने आंटी के योनि-प्रदेश की शेव बनाई, चोदने का रास्ता साफ़ किया।
यही मेरा पहले अनुभव था, उसके बाद की कई मज़ेदार कहानियाँ हैं, आगे बताऊंगा।
उसके बाद तो मुझे चोदने के रुपए भी मिलने लगे !
तुम्हारा दोस्त
पुनीत
k.puneet80@yahoo.com