मेरी पहली सुहागरात थी



मेरी पहली सुहागरात थी

सपनों से मुलाकात थी

उत्सुकता बढ़ी थी कि

कब उसका दीदार कर लूँ

जी भर कर उसे प्यार कर लूँ

मारे उमंग के मैं उस कमरे घुस गया

विशाल काया को देखकर एक पल मैं रूक गया

पर दूसरे पल जाने कहाँ मेरा सारा प्रेम गया

चिलमन उठाकर देखा तो वो हुंकार भर रही थी

मुक्का तान कर वो अपने प्यार का इजहार कर रही थी

भीमकाय काया देखकर मेरा बदन कांप गया

डर के मारे मैं निकलकर चिरकुट की तरह भाग गया

कमसिन कली थी पर ग्रेट खली थी

लगता था वो दारा सिंह के स्कूल में पढ़ी थी

भागा हुआ मैं अपने दोस्त के यहाँ पहुँच गया

देखकर वहाँ मुझे वह संकोच से भर गया

और बोला यार बता तू क्यों क्लास छोड़कर भाग आया

मैंने कहा यार मैं सुहागरात नहीं मनाऊँगा

जानबूझ कर मैं मौत के मुँह में ना जाऊँगा

मेरा मित्र बोला चिंता न कर यार, मैं मित्रता निभाऊँगा

तेरी जगह सुहागरात मनाने मैं चला जाऊँगा

मित्र की बात सुनकर मैं कृतज्ञ हो गया

ऐसा मित्र पाकर मैं धन्य हो गया

मैंने कहा कि यार तेरा कर्ज किस जनम चुकाऊँगा

उसने कहा चिन्ता न कर अगले जन्म तेरे लिए शादी मैं रचाऊँगा

क्या करूँ विलम्ब के लिए खेद है बहुत

पर रंडुआ हूं यार इस जनम मैं मौका नहीं दे पाऊँगा।


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