हेड गर्ल बनने के लिए-2

, 9 September 2009


प्रेषिका : निधि सेठ

पहले मिलन में उसने मुझे कई तरीकों से चोदा और आखिर मैं झड़ने लगी, कुछ समय बाद वो भी झड़ने लगा और हम एक दूसरे को चूमते हुए पसर गए।

काफी देर हो गई थी, मैंने कहा- नीचे चलना चाहिए !

बोला- नहीं, आज तेरी यह रात मेरे लिए है, सुबह उजाला होने से पहले तुझे तेरे घर छोड़ दूँगा।

वो दोबारा मेरे जिस्म से खेलने लगा, मैं उल्टी लेटी थी, वो मेरे चूतड़ चूम रहा था, बोला- थोड़ा सा उठा !

जैसे मैंने अपने चूतड़ उठाए, उसने चूतड़ फ़ैला कर मेरे छेद पर थूका और ऊँगली से चोदने लगा।

“यह क्या कर रहे हो?”

“तेरी कातिल गाण्ड का दीवाना हो गया हूँ !” उसने दूसरी ऊँगली भी घुसा दी और फिर उसने मेरे मुँह में लण्ड घुसा कर कहा- पूरे गंदे तरीके से थूक थूक कर चाटो !

पूरा गीला हुआ लण्ड निकाला और मुझे घोड़ी बना लिया।

उसने मुझे कब्ज़े में कर सुपारे को गाण्ड के छेद पर लगाया और झटका दिया। दर्द से चीख निकल जाती अगर उसने समय पर हाथ न रखा होता।

जब गाण्ड आराम से बजने लगी तो उसने मेरा मुँह छोड़ा।

“यह क्या किया डार्लिंग?”

“तेरी गाण्ड का ही तो मैं असली दीवाना था ! पार्टी में तेरी इसी उभरी गाण्ड पर ही मेरी नियत ख़राब हुई थी !”

उस रात उसने मेरी दोनों तरफ की सीलों को तोड़ दिया था, वो पाँच दिन रुका, रोज़ मैं उसको मिलती थी और हम चुदाई का हर मजा उठाते थे।

उसके जाते ही मैं उदास हो गई, आशिक तो कई थे मेरे पर घर में यार बुलाने से डरती थी। आशिक ऐसे कि उनसे जगह का इंतजाम नहीं होता था, मैं मुँह से कह नहीं सकती थी। कह देती तो रण्डी से कम न कहलाती। पर गुस्सा मुझे बहुत आता था।

एक दोपहर मैं ऊपर कमरे की खिड़की पर खड़ी थी, मौसम बहुत सुहाना हो गया था, काले बादल छाये थे, अँधेरा सा होने लगा, घर में अकेली थी, नीचे नज़र गई तो पिछवाड़े में मेरा ड्राईवर सोनू अंडरवीयर में खड़ा था।

बारिश होने लगी, मैं नीचे गई शॉर्ट्स और टीशर्ट में थी, मैंने टीशर्ट उतारी और ब्रा में बाहर पिछवाड़े बारिश का मजा लेने लगी।

सोनू मुझे देख पागल होने लगा।

उसके करीब गई, बोली- अकेले ही मौसम का मजा ले रहे हो?

वो बेचारा क्या करता !

मैं ही पहल करते हुए उसके आगे गई, मुड़ी और थोड़ा झुकते हुए अपनी गाण्ड को उसके अंडरवीयर पर रगड़ने लगी।

वो भी मर्द था उसने मेरी कमर में हाथ डाला और पीठ चूमने लगा।

मैंने हाथ नीचे ले जा कर उसका लण्ड पकड़ लिया। काली घटा और छा गई, अँधेरा सा था, मैंने शॉर्ट्स भी उतार दी।

लाल ब्रा-पैंटी में पत्थर पर लेट गई, वो मेरे ऊपर चढ़ गया।

मैंने ब्रा खोल दी, मेरे बड़े बड़े मम्मों को चूसने लगा वो ! पानी ने यह सारी आग लगाई थी !

मैंने उसके लण्ड को निकाला और चूसने लगी। अब हम कोने में चले गए, मैं बैठी थी, वो खड़ा था। फिर उसने मेरी चूत में लण्ड घुसा दिया, उसका बहुत बड़ा था, थोड़ी तकलीफ हुई लेकिन फिर जो मजा आया बता नहीं सकती।

आसमान के नीचे चुदने का अलग ही मजा आया। उस दिन के बाद मैं और सोनू मौका मिलते एक होने लगे।

इस तरह मैंने कई लड़कों से मजे किये।

इस तरह से मुझे चुदाई का ख़ासा शौक लग गया, जैसे जैसे मेरे आशिक बढ़ने लगे, तैसे तैसे मेरी आग और मचलने लगी थी। वरिंद्र के बाद सोनू जो मेरा ड्राईवर था, उसने मुझे बहुत मजे दिए।

समय बीता, मैंने हाई स्कूल से हायर-सैकंड्री स्कूल में दाखिला लिया, जब मेरा दाखला हो रहा था, दफ्तर में बैठे हर मर्द की नजर मेरी छाती पर थी, जब मैं बैठी तो गहरे गले की वजह से मेरा चीर दिखने लगा था, प्रिंसिपल बोला- किसको दाखिल करवाना है?

माँ बोली- यह है मेरी बेटी ! इसका दाखिला करवाना है !

“ठीक है ! कर लेंगे दाखिल !” उसकी नज़र फिर वहीं जाकर रूकती।

वो बोला- यह हमारे स्पोर्ट्स टीचर इनको नाम लिखवा दो, कल से भेज देना।

उसकी नज़र भी मेरी छातियों में टिकने लगी। दाखला हो गया, अभी मैंने यूनीफ़ॉर्म बनवाई नहीं थी इसलिए कुछ दिन ऐसे जाना पड़ना था।

उस दिन गला तो ज्यादा गहरा नहीं था लेकिन मेरा टॉप कुछ कसा हुआ था, मेरे बड़े-बड़े मम्मे उसमें जलवे बिखेर रहे थे।

लड़कियों का स्कूल था, मर्द सिर्फ दस होंगे, प्रिंसीपल ने चपड़ासी भेज कर मुझे दफ्तर में बुलाया।

वो अकेला था, बोला- हाँ, कैसा लगा रहा है स्कूल?

“सर, बहुत अच्छा है !”

“कोई परेशानी हो तो मुझसे ही मिलना !”

जाते जाते बोला- वैसे इन कपड़ों में बहुत ज़बरदस्त सुंदर दिखती हो, लेकिन जल्दी से ड्रेस बनवा लो क्योंकि नियम हैं वरना मैं तुझे कभी ऐसे कपड़ों से मना नहीं करता ! “नो प्रॉब्लम सर ! मुझे मालूम है कि यह स्कूल है, कोई रैंप नहीं है !”

सभी टीचर मेरा ख़ास ध्यान रखते थे। एक दिन पंजाबी वाले सर ने मुझे अकेली को बिठा लिया, पूछने लगे- कोई दिक्कत तो नहीं?

साथ साथ वो मेरी पीठ सहला देते शाबाश करने के बहाने ! पीठ से हाथ आगे बढ़कर पेट पर आ गया, सहलाते हुए हाथ मेरे मम्मों पर रेंगने लगा।

“सर, यह सब क्या करने लगे?”

“क्यूंकि तुम बहुत सुंदर हो, एक बार बाँहों में कस लेने दो, फिर चली जाना ! ऊपरी मजा ही लेंगे, फिर तो ड्रेस तैयार हो जायेगी, उससे पहले मुझे इनके दर्शन करवा दे, पहले दिन से तुमने यह दिखा सभी मास्टरों के लण्ड हिला कर रख दिए थे, तू नहीं जानती तेरी यह छाती यहाँ चर्चित हो चुकी है।”

“कोई देख लेगा? अचानक कोई आ गया फिर?”

“तुझे हर सहूलियत दिलवाऊँगा ! आज झलते हुए को छोड़कर ना जाना !”

मैंने जल्दी से टीशर्ट उतारी, काली ब्रा में कैद कबूतर देख सर का अगला हिस्सा टेंट बन गया था।

“वाह वाह ! ऐसी छाती किसी टीचर की भी नहीं होगी !” उन्होंने आगे बढ़कर ब्रा की हुक खोली, फड़फड़ाते मम्मे देख सर ने मुझे मेज़ पर लिटा लिया और स्तनपान करने लगे।

“सर, स्कूल है यह !” उनको पीछे किया, जल्दी से हुक बंद की, टीशर्ट पहनी।

“किसी दिन मेरे घर चलते हैं !”

“देखूँगी सर !” चली आई।

पंजाबी वाले सर वाईस प्रिंसीपल भी थे।

समय बीतने लगा, ड्रेस भी जो बनवाई, छाती से कसी हुई।

हम तीन सहेलियाँ बन गई, कुछ लड़कियाँ मुझसे जलती थी- तुम सेक्सी तो बहुत हो, लेकिन देखो कदर पढ़ाई करने वालों की होती है। मैं मॉनिटर हूँ, तुम सिर्फ चीज़ बन कर रह गई हो !

मैंने कहा- तेरे पल्ले क्या है? न ऊपर से कुछ है, न पिछवाड़े में कुछ है !

पर उसकी बात अब मेरे लिए चुनौती थी, पंजाबी के सर ही हमारे क्लास इंचार्ज बन गए, मैं कुछ ही दिन बाद उनके पास गई और मुझे देख उनका चेहरा खिलने लगा- आओ ! आओ बैठो !

“सर, मुझे मॉनिटर बनना है !”

“बना दूँगा, चिंता मत कर ! देख ना तुम मेरा काम नहीं कर रही, मैं फिर भी तेरा कर दूंगा। कल तुम स्कूल की बगल वाली गली में मिलना, स्कूल में अंदर मत जाना तेरी छुट्टी नहीं लगेगी, मैं भी कार से वहीं आऊँगा, फिर घूमने चलेंगे !

उनकी बात मैंने मानी, अगले ही दिन स्कूल के बजाये उनके कार में बैठ गई। वो मुझे एक घर में ले गए, खुद ताला खोला, दोनों अंदर चले गए।

“कल तुम मॉनिटर बनोगी ! आओ आओ ! मुझे बेडरूम में ले गए।

मैं बिस्तर पर अधलेटी सी बैठ गई, वो भी आ गए- आज मत तड़फा ! उतार दे इस कमीज़ को जानू !

“खुद उतार डालो ना !”

“हाय मेरी जान ! यह हुई ना बात !”

उसने मेरी कमीज उतारी, मैंने भी धीरे धीरे उनकी शर्ट के बटन खोले, उनकी छाती पर होंठ रगड़ दिए।

बाकी अगले भाग में ज़ारी रहेगा।

[email protected]

Download PDF पीडीएफ प्रारूप में इस कहानी को डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें

comments powered by Disqus