एक दूनी दो-1

, 18 June 2008


लेखक : जीत शर्मा (प्रेम गुरु द्वारा संपादित एवं संशोधित)

दोस्तो ! सबसे पहले मैं आप सभी पाठकों और अन्तर्वासना का धन्यवाद करना चाहूँगा कि आपने मेरी कहानी “इब तो बाड़ दे” के दोनों भाग बहुत पसंद किये। यह उससे आगे की कहानी है। मोनिका और मास्टरनी की चुदाई के बाद मेरी यह कहानी भी मेरे गुरु भाई प्रेम गुरु ने उन्हीं दिनों संपादित एवं संशोधित की थी। पर मैं पिछले 6-8 महीनो से दुबई में था तो अन्तर्वासना पर अपनी कहानी नहीं भेज पाया। खैर मैं अब मुद्दे पर आता हूँ :

मास्टरनी की चुदाई के दौरान एक बार मैंने उसकी गाण्ड के छेद से भी छेड़खानी कर डाली थी तो उसने मुझे कहा था कि अभी मैं इस छेद को ना छेड़ूँ बाद में वह मुझे इसका मज़ा भी देगी। मैं तो इस बात को सोच कर इतना रोमांचित हो गया था कि मुझे तो फिर उस रात देर गए तक नींद ही नहीं आई और फिर जब तड़के मेरी आँख लगी तो उसकी मोटी मोटी गाण्ड ही सपने में दिखाई देती रही थी।

अगले दिन मैं ट्यूशन के समय से कुछ देर पहले ही उसके घर पहुँच गया। दरवाजा बंद नहीं था बस थोड़ा सा भिड़ा हुआ था। मैं बिना घंटी बजाये और आवाज किये ड्राइंग रूम में आ गया। अन्दर मास्टरनी के कमरे से जोर जोर से खिलखिलाने की आवाजें आ रही थी। मैं ठिठक गया और ध्यान से उन आवाजों को सुनाने लगा।

“अरी ओ हरामजादी ! जरा जोर से चूस ना ! क्या व्रत कर रखा है ?”

“अनीता तू तो एक नंबर की छिनाल है … चूसने से तेरा क्या बनेगा ? तेरी तो कोई हरयाणवी सांड अपने लट्ठ से फाड़ेगा तब मज़ा आएगा !”

“ही ही… क्या बात करती है ?”

“अनीता ! एक बात बता ! वो जो नया लौंडा है ना ?”

“हम्म …?”

“बड़ा दिलकश पपलू लगता है ! कहीं उसका खा तो नहीं गई ?”

“क्यों तेरी गाण्ड क्यों सुलग रही है ?”

“साली रंडी ऐसे तो मेरी बहन बनती है और अकेली-अकेली उसका लण्ड घोंट भी गई ?”

“हाय ! क्या मस्त सांड है ! मैं तो उसका रस पीकर निहाल ही हो गई।”

“अनीता मुझे भी एक बार उस पप्पू का रस पिला दे ना ?”

“मेरा तो पेट भर जाने दे, उसके बाद तू भी पी लेना !”

“तू तो एक नंबर की हरामजादी है। पेट नहीं, तेरी तो गाण्ड भर जायेगी, तब मानेगी !”

“चल कोई बात नहीं ! मैंने तुझे सौतन नहीं, बहन माना है, किसी दिन तेरा भी कल्याण करवा दूँगी !”

“जीयो मेरी जान !” फिर खिलखिलाने की आवाज आने लगी।

और उसके बाद मुझे चुपड़ चुपड़ की आवाजें सुनाई देने लगी जैसे कोई किसी चीज को चाट या चूस रहा है।

“ऊईईईईईईइ ………… माँ ……………….”

“और जोर से चूस ! मेरा भी निकलने वाला है… आआआआआआ…… ईईईईईईई …”

अब मैं इतना पपलू भी नहीं था कि मैं इस बात का अंदाज़ा ना लगा पाता कि अन्दर क्या चल रहा था। जरूर मास्टरनी और कान्ता एक दूसरे की चूत चूस रही होंगी। मैं अभी यही सोच रहा था कि अन्दर जाऊं या थोड़ी देर रुकूं इतने में कान्ता की मीठी आवाज आवाज सुनाई दी,”ईईईईईईई … अनीता ….. मैं भी गई ……ईईईई ”

मैं तो जड़ बना वहीं खड़ा रहा। मेरा लण्ड तो इस समय अपनी पूर्ण उत्तेजना और ऊंचाई पर था। कोई 5-7 मिनट की चुप्पी के बाद अन्दर से फिर खुसुर फुसर की सी आवाजें आती रही जो मैं ठीक से ना तो सुन ही पाया ना समझ पाया।

फिर कान्ता की आवाज मेरे कानो में पड़ी “अनीता, इब मैं जाती हूँ ! तेरे चिकने पप्पू के आने को टेम हो गयो हे !”

मेरा अंदाज़ा था अब कान्ता कमरे से निकलने ही वाली है। मैं झट से ड्राइंग रूम के दरवाजे से हट कर बाहर की ओर आ गया। और इस तरह खड़ा हो गया जैसे अभी आ ही रहा हूँ। इतने में कान्ता बाहर आ गई। वो बड़े रहस्यमयी ढंग से मेरी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी। मैं भोला बना अपनी मुंडी नीचे किये दरवाजे की ओर आ गया।

मास्टरनी ड्राइंग रूम में ही खड़ी मिल गई। उसने आज झीनी सी नाइटी डाल रखी थी जिसमें उसके मोटे मोटे उरोजों की अकड़ी हुई तीखी घुन्डियाँ साफ़ नज़र आ रही थी। मानो इन्हें अभी अभी चूसा गया हो। वो खड़ी नाइटी के ऊपर से ही अपनी चूत को खुजला रही थी।

मुझे देखते ही उसने मेरी ओर अपनी बाहें फैला दी। मुझे हैरानी हो रही थी कि आज उसने दरवाजे की कुण्डी लगाने को क्यों नहीं बोला। हम दोनों ने एक दूसरे को जोर से अपनी बाहों में जकड़ कर चूम लिया जैसे कोई बिछुड़े प्रेमी प्रेमिका हों। आज तो उसके शरीर से कोई सुगन्धित इतर जैसी खुशबू आ रही थी। थोड़ी देर चूमा-चाटी के बाद उसने कमरे के अन्दर चलने का इशारा किया।

कमरे में आने के बाद उसने मुझे अपने कपड़े उतार देने का इशारा किया। वो बड़ी जल्दी में लग रही थी। अब उसने भी अपनी नाइटी निकाल फैंकी। सबसे पहले मेरा ध्यान उसकी चूत पर गया। आज तो उसने अपनी चूत को एक दम चकाचक बना रखा था। लगता था जैसे अभी थोड़ी देर पहले ही साफ़ की हो। उसकी फांकें थोड़ी सूजी हुई और लाल-लाल लग रही थी। पता नहीं कान्ता के चूसने से ऐसा हुआ था या शेव करने के कारण ऐसा लग रहा था।

मास्टरनी अपनी जांघें चौड़ी करके बिस्तर पर लेट गई। मुझे लगा वो पहले अपनी चूत को चुसवाने के चक्कर में है। मुझे भला क्या ऐतराज़ हो सकता था। मैं भी अपने कपड़े उतार चुका था। अब मैं उसकी जाँघों के बीच आ गया और अपने घुटनों के बल होकर उसकी चूत को अपने मुँह में भर लिया। चूत में तो काम रस का उबाल ही आया हुआ था। उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ लिया और जोर जोर से अपनी चूत पर दबाने लगी और साथ साथ मीठी सीत्कार भी करने लगी। मुझे ज्यादा मज़ा तो नहीं आ रहा था पर मैंने चुसाई जारी रखी। मैं तो आज उसके दूसरे छेद का उदघाटन करने के चक्कर में था और उसकी चूत की चुसाई करके उसे खुश कर देना चाहता था।

मैं अभी ख्यालों में खोया ही था कि उसकी गाण्ड किस आसन में मारनी ठीक रहेगी घोड़ी बना कर या फिर किसी दूसरे आसन में कि अचानक ताली बजने के साथ किसी तीसरे व्यक्ति की आवाज मेरे कानों में पड़ी,”ओये होए … इस पप्पू के आते ही शुरू भी हो गई साली छिनाल ?”

मैं तो इस अप्रत्याशित आवाज से हड़बड़ा ही गया। मुझे तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मैं उठ कर बैठ गया और अपनी शर्ट और पैंट से अपने गुप्तांगों को ढक लिया पर पर मास्टरनी लेटी ही रही।

मुझे हैरान देख कर मास्टरनी बोली,”रे जीत, कोई बात नई … तू इस रांड की परवाह ना कर !”

और फिर वो दोनों ही खिलखिला कर हंसने लगी। अब मुझे समझ आया कि थोड़ी देर पहले जो खुसर फुसर कर रही थी यह इन दोनों की मिली भगत थी।

“अनीता … तू तो मज़ा ले ही चुकी है, एक बार मुझे भी तो इसका रस पी लेने दे !”

“मेरी चूत में जो बिच्छू काट रहे हैं पहले उसका इलाज तो हो लेने दे !”

“तेरे बिच्छू मैं मार दूंगी, चिंता ना कर !”

और फिर कान्ता हमारे पास बिस्तर पर आकर बैठ गई। शायद वो कपड़े बदलने गई थी। अब वो भी साड़ी की जगह नाइटी पहन आई थी। अब उसने भी अपनी नाइटी निकाल फैंकी। अब तो हम तीनों ही प्राकृतिक अवस्था में थे। उसने भी अपनी चूत को टिच्च कर रखा था। शायद मास्टरनी ने समझा दिया होगा।

“वो दरवाजा ….?” मैं डर रहा था कोई और ना आ जाए।

“चिंता ना कर मेरे सांड, इब कोई ना आवे इन्हा ? दरवाजा बंद सै !”

अब कांता ने मेरा लण्ड अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे मसलने लगी।

“अनीता तू सच कहती थी यह तो पूरा सांड जैसा है … आह … देख किस तरह झटके खा रिया सै ?” और फिर उसने मेरे ठुमके लगाते लण्ड के सुपारे पर एक चुम्मा ले लिया। और फिर उसे मुँह में लेकर चूसने लगी।

मास्टरनी ने मुझे लेट जाने का इशारा किया। कान्ता मेरी जाँघों के बीच बैठी मेरा लण्ड चूसने में व्यस्त थी और अब मास्टरनी ने अपने दोनों पैर मेरे सर के दोनों ओर करते हुए अपनी चूत ठीक मेरे मुँह पर रख दी। मैं जैसे ही उसे चूसने लगा उसने अपनी चूत को मेरे मुँह पर रगड़ना चालू कर दिया। उसका चूत रस मेरे होंठों और नाक पर पुत गया। उधर कान्ता मेरे लण्ड को किसी लॉलीपॉप की तरह चूसे जा रही थी। उसके मुँह का गुनगुना अहसास तो मुझे मास्टरनी की चूत से भी ज्यादा अच्छा लग रहा था। कभी वो सुपारे को चूसती कभी पूरा लण्ड मुँह में लेकर उसे धीरे धीरे बाहर निकालती। साथ साथ मेरे अण्डों को भी सहलाती जा रही थी। मुझे लगा अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं तो इसके मुँह में ही झड़ जाऊँगा।

मैंने अपने एक हाथ से मास्टरनी की कमर पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ उसके नितम्बों के बीच फिराते हुए उसकी गाण्ड का छेद टटोलने लगा। अचानक मेरी अंगुलियाँ उसकी गाण्ड के छेद से जा टकराई। गाण्ड का छेद चिकना और गीला सा हो रहा था। मैंने अपनी एक अंगुली उसमें डालने की कोशिश की तो मास्टरनी थोड़ी से चिहुंकी फिर तो होले होले वो भी अपने नितम्ब हिलाने लगी।

अचानक मेरा मुँह उस चिर परिचित सहस्त्रधारा के जल से भर उठा। मास्टरनी की चूत ने रस छोड़ दिया था। अब मास्टरनी खड़ी हो गई और कान्ता को धक्का देते हुए बोली,”अरी ओ हरामजादी, इब इसनै छोड़ दे … इबी इसका रस पीन का टेम नई आया।”

कान्ता अपने होंठों पर जबान फेरती हट गई। मैं उठाने को हुआ तो मास्टरनी ने मुझे लेटे रहने का इशारा किया और फिर उन दोनों ने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा सा किया। फिर कान्ता अपने दोनों पैर मेरे कूल्हों के दोनों और करके मेरे लण्ड पर बैठ गई। उसने एक हाथ से मेरा लण्ड पकड़ा और अपनी चूत के छेद पर लगा दिया। चूत तो अन्दर से इतनी गीली लग रही थी जैसे रस भरी हो। और फिर वो गच्च से नीचे बैठ गई। मेरा लण्ड एक ही झटके में अन्दर चला गया।

मास्टरनी ने अब अपने उरोज मेरे मुँह से लगा दिए। मैं किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसे चूसने लगा। कान्ता मेरे लण्ड पर उछल-कूद मचाने लगी थी।

सच कहता हूँ मेरे लिए तो यह सब किसी ब्लू फिल्म की तरह ही था। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि एक साथ दो दो चूतें इस प्रकार मुझे मिल जायेंगी। भगवान् भी जब देता है तो दो दो एक साथ देता है। मैं तो अब यही सोच रहा था कि गोपी किशन ने अपनी तरह मुझे चार हाथ और दो लण्ड क्यों नहीं दिए।

मैं बारी बारी मास्टरनी के दोनों उरोजों को चूसता रहा। मास्टरनी किसी और फिराक में ही लगती थी। वो परे हट गई। अब मेरा ध्यान कांता के नितम्बों पर गया। गोरे रंग के मांसल नितम्ब तो मास्टरनी से भी अधिक मोटे और गुदाज़ थे। मैं अपने हाथों के बल उठ गया और उसकी कमर पकड़ ली। अब मास्टरनी ने उसे घोड़ी वाली मुद्रा में हो जाने को कहा। कान्ता ने अपनी मुंडी नीचे करते हुए अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। मैं उसकी कमर पकड़े उसके साथ ही चिपका हुआ उसके पीछे अपने घुटनों के बल हो गया। मेरा राम लाल तो कब का घोड़ी की सवारी करने को बेताब था। मैंने झट से उसकी कमर पकड़ी और जोर जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए। कान्ता की मीठी सीत्कारें निकलने लगी।

वैसे खेली-खाई तजुर्बेकार औरतों के साथ यह बड़ा आराम होता है कि ज्यादा नखरे नहीं करती। सारे काम तसल्ली से फटाफट करवा लेती हैं। मैंने धक्को के साथ उसके नितम्बों पर थप्पड़ भी लगाने चालू कर दिए। मैंने मस्तराम की कहानियों में पढ़ा था कि इस प्रकार की चुदैड़ औरतों को अपने नितम्बों पर मार खाना बहुत अच्छा लगता है।

अब मास्टरनी मेरे नजदीक आ कर बैठ गई और पहले तो उसने अपना हाथ नीचे करके उसकी चूत को टटोला और फिर मेरे अण्डों को पकड़ कर मसलने लगी। मैं तो रोमांच के शिखर पर ही पहुँच गया। मैंने एक हाथ से उसके उरोजों को पकड़ लिया और उसे मसलने लगा।

कान्ता ने जोर जोर से अपनी चूत को सिकोड़ना चालू कर दिया और आह … या … उईईईई … की आवाजें करने लगी। मुझे लगा वो झड़ने के करीब है। मैंने अपने धक्कों की गति बढ़ा दी। मास्टरनी ने अब कान्ता के नितम्बों पर थपकी लगाने चालू कर दी। एक हाथ से उसने उसके एक नितम्ब को चौड़ा किया तो उसका भूरे रंग का छेद नज़र आने लगा। मास्टरनी ने अपनी एक अंगुली पर थूक लगाया और फिर कान्ता की गाण्ड के छेद पर पहले तो थोड़ा सा रगड़ा और फिर अपनी पूरी अंगुली उसकी गाण्ड में ठोक दी।

कान्ता की एक मीठी किलकारी निकल आ गई और फिर मुझे लगा मेरे लण्ड के चारों ओर चिपचिपा सा रस लग गया है और फिर तो लण्ड जैसे ही अन्दर जाता फिक्च फिक्च की आवाजें आनी चालू हो गई। मुझे लगा कान्ता झड़ गई है।

अब मास्टरनी हट गई तो मैंने कान्ता की कमर पकड़ी और जोर जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए। कांता अह …. उन्ह … तो करती रही पर उसने अब नितम्ब हिलाना बंद कर दिया था।

“अब ओ… सांड इब निकाल दे अपना माल …! आह … मैं तो थक गई … बस कर …” कान्ता कुनमुनाने लगी।

“मेरी जान, ठहर तो सही … आह … बस मेरा भी निकालने वाला है !” मैंने कस कर उसकी कमर पकड़ ली। मुझे डर था कहीं वो इस समय पर हट कर मेरा काम खराब ना कर दे। पर वो कहाँ मानने वाली थी। वो झट से नीचे होते हुए मेरी पकड़ से निकल गई और फिर उसने मेरा लण्ड जल्दी से अपने मुँह में भर लिया। मैं तो कगार पर ही था। उसने अभी कोई 4-5 चुस्की ही लगाई थी कि मुझे लगा मेरा लावा फूटने वाला है। मैंने कस कर उसका सर पकड़ लिया और जैसे चूत में धक्के लगाते हैं उसके मुँह को चोदने लगा।

मास्टरनी हम दोनों को देखे जा रही थी। वो पास आ कर उकडू बैठ गई गई और अपने एक हाथ से अपनी चूत में फिर से अंगुली करने लगी। साथ ही उसने मेरे लण्ड के नीचे लटकते अण्डों को पकड़ कर मसलना चालू कर दिया।

“या ………… ईईईईईई ……. !” मेरे सारे शरीर में सनसनी सी दौड़ने लगी और मुँह से गुर्राहट सी निकली और फिर पिछले 20-25 मिनट से कुलबुलाता लावा फूट गया। पता नहीं कितनी पिचकारियाँ निकली होंगी। कान्ता का मुँह मेरे वीर्य से भर गया। वो तो उस रस को किसी मीठी मलाई की तरह पीती चली गई। एक भी बूँद बाहर नहीं आने दी साली ने।

मैंने कहीं पढ़ा था अगर कोई अधेड़ स्त्री किसी किशोर लड़के का वीर्यपान करे और उसे चुदाई करवाती रहे तो जवान बनी रहती है और कोई प्रौढ़ आदमी किसी किशोरी से सम्भोग करे या उसका चूत रस पी ले उसकी जवानी लौट आती है। पता नहीं यह कितना सच था पर मैं तो आज उसे अपना रस पिला कर धन्य ही हो गया था।

मैं होले होले धक्के लगता अपने नितम्ब हिलाता अपनी अंतिम बूँद तक उसके मुँह में ही निचोड़ कर अपने लण्ड को बाहर करना चाहता था। हालांकि कल मास्टरनी ने भी मेरा लण्ड जरुर चूसा था पर यह कान्ता तो उससे बड़ी खिलाड़ी लग रही थी।

सारा माल पी जाने के बाद ही उसने मेरे लण्ड को मुँह से बाहर निकला। और फिर अपने होंठों पर जबान फेरती बोली,”वाह … मेरे सांड, तुम्हारा रस तो घणा मीठा था, मज़ा आ गया !”

शेष कहानी अगले भाग में !

प्रकाशित: मंगलवार 16 अगस्त 2011 11:53 pm

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