The Internal Desire |
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#91
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रुचिका प्रकरण में चौतरफा घिरे हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ पर सोमवार को चंडीगढ़ की जिला अदालत परिसर में एक युवक ने अचानक हमला कर दिया। युवक ने राठौड़ पर चाकू से कई वार किए। जिससे उनके गाल पर तीन और गले में चार जगह चोट लग गई। अस्पताल में उन्हें सात टांके लगे। पुलिस ने युवक को मौके पर ही दबोच लिया। 24 वर्षीय उत्सव शर्मा नामक यह युवक उत्तर प्रदेश के वाराणसी का रहनेवाला है। राठौड़ अपनी जमानत अर्जी पर सुनवाई के सिलसिले में अदालत आए थे।
उत्सव शर्मा अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन [एनआईडी] का छात्र है और वहां से एनीमेशन का कोर्स कर रहा है। उसे मानसिक समस्या से ग्रस्त बताया जा रहा है। उसका वहां इलाज भी चल रहा है। पुलिस के अुनसार आरोपी उत्सव ने राठौड़ पर पिछले कई दिनों से नजर रखे हुए था। उसके मन में राठौड़ को चोट पहुंचाकर रुचिका प्रकरण में इंसाफ दिलाने की बात थी। उत्सव के परिजनों से भी पुलिस ने संपर्क किया तो पता चला कि वह मानसिक रूप से ठीक नहीं है और उसका इलाज अहमदाबाद में एक डाक्टर के पास करवाया जा रहा है। इसके बाद पुलिस ने उस डाक्टर से भी बात की, जिसके यहां उसका इलाज चल रहा है। डाक्टर ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उसके पास उत्सव का इलाज चल रहा है। अब सवाल ये उठता है कि क्या उत्सव शर्मा सचमुच मानसिक रुप से बिमार है?
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#92
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कमीज उतारो मत तमीज छोडो मत मौसी से दूर की दुआ सलाम ही रखे |
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#93
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बहुत सटीक जवाब है आपका।
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#94
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सविता जी काम तो उसने अच्छा किया पर अपना लगभग पूरा करियर बर्बाद कर लिया... क्या ये उसके खुद के लिए सही है..???
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सुखी जीवन के लिए थोड़ी अज्ञानता भी जरूरी है..... शायद इसीलिए में ज्ञान से दूर हूँ..... ![]() ![]() |
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#95
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पहले वो लोग नाजियों को पकड़ने के लिये आये... मै कुछ नही बोला, क्योंकि मै नाजी नही था। फिर यो यहुदियों को पकड़ने के लिये आये... मै कुछ नही बोला, क्योंकि मै यहुदी नहीं था। फिर वो कम्युनिस्टो को पकड़ने के लिये आये... मै कुछ नही बोला, क्योंकि मै कम्युनिस्ट भी नहीं था। फिर वो मुझें पकड़ने के लिये आये, इस बार बोलने वाला कोई बचा ही नहीं था। जागो रे!!!
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#96
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वो तो भला हो उस मिडिया का, जो "सनसनीखेज" और "ब्रेकिंग न्युज" के चक्कर में कभी-कभी कोई अच्छा काम भी कर जाती है, वर्ना -
राठोर जैसे लोगो को परिवारवालों का भी खूब सहयोग मिलजाता है जबकि रुचिका जैसे पीड़ित लोगो के परिवारवाले भी पूरे परिदृश्य से गायब होना या झुक जाना ज्यादा पसंद करते है .क्या राठोर की पत्नी और उसे जानने वालो ने उसका सामाजिक बहिष्कार किया ? उल्टा उनकी पत्नी कोर्ट रूम में उसके साथ खड़ी होकर उनके साथ होने का प्रमाण दे रही थी.क्या लोगो को राठोर को सामाजिक निमंत्रण सूची से बाहर निकला ? अगर न्याय के लिए यही हमारी प्रतिबधता है तो न्याय का यही हाल होगा और राठोड जैसे लोग तुरंत सजा के बाद जमानत पा कर हंसा करेगे . आरोपी को परिवार का सहयोग मिलने वाली बात सिर्फ राठोर के सन्दर्भ में ही नहीं और कई केस जैसे आर के शर्मा - शिवानी भटनागर , प्रियदर्शनी मट्टू, जेस्सिका लाल के केस में भी हम देखते है. धनञ्जय को फासी की सजा में उसकी पत्नी और उसका पूरा परिवार उसे निर्दोष साबित करने के लिए खड़ा था पर पीडिता /मृतिका के परिवार वालो का कुछ पता नहीं था .
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#97
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अंग्रेजी में एक कहावत है की ''delays in justice is injustice'' और ये सच में रुचिका के केस में ये ही हुआ है...अब सजा मिलने का कोई खास फायदा नही है...और वो भी इतनी कम...और जनता की बात न की जाये तो ठीक होगा..क्योकि जनता तब तक सोयी रहेती है जब तक उनके साथ कुछ न हो...जो तन बीती वो तन जाने..
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लॉन टेनिस खेलने आई रुचिका को शायद यह नहीं पता था कि एसोसिएशन का संचालक राठौर उसके जीवन का खेल ही खत्म कर देगा। 1990 को राठौर ने रुचिका से छेड़छाड़ की। इससे रुचिका इतनी परेशान हो गई कि तीन साल बाद उसने जहर खाकर अपनी जान दे दी। नौकरशाहों का रुतबा इतना बडा है कि अटल बिहारी वाजपेई के आंसू भी राठौर के पदोन्नति में बाधक न बन सका। केंद्रीय मंत्री शांताकुमार द्वारा अटल जी के सामने यह प्रकरण लाया गया था। राठौर को सजा के बदले हरियाणा की सभी सरकारों ने राठौर के कुकृत्यों को पदोन्नति देकर हौसला बढाया। अब जब रुचिका को न्याय मिलने की उम्मीद जगी थी तो यह न्याय देखकर सब चौंक गए कि इतने गंभीर मामले में पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर को मात्र छह महीने की ही सजा क्यों हुई। इस फैसले के बाद पूरा देश आक्रोशित है।
सड़क से लेकर संसद तक यह मामला गूंज रहा है। रुचिका गिरहोत्रा 14 की थी जब तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एस.पी.एस राठौर ने उसके साथ बदसलूकी की। उसने शिकायत की तो उसके परिवार पर पुलिसिया जुल्म ढाए गए। अपनी आबरू पर हाथ डालने वाले के खिलाफ उसकी लड़ाई में धीरे-धीरे सब टूट रहा था। उसके भाई को पुलिस ने मुजरिम बना दिया। उसके पिता को शहर छोड़ना पड़ा। तीन साल में उसके भविष्य के सपने टूट गए और उसने जहर निगलकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। तब वह सत्रह की थी। रुचिका की खुदकुशी के बाद भी हरियाणा पुलिस उससे बदला लेती रही। उसकी पहचान छिपाने के लिए पंचनामे में रुचिका का नाम रूबी लिख दिया गया। रुचिका ने खुदकुशी छेड़खानी से परेशान होकर नहीं की। लेकिन हरियाणा पुलिस और प्रशासन ने उसकी हिम्मत तोड़ दी। पुलिसकर्मियों को चूंकि कानून की अधिक जानकरी होती है अत: उनके गुनाहों पर कानून का जामा डल जाता है।
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#99
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बडे पदों पर रहने वाले किसी भी व्यक्ति पर कानूनी लडाई लडना कठिन काम होता है। ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं, जब गुनाहगार न्यायालय की सीढियों पर ही नहीं चढाया जा सकता। रुचिका की सहेली के माता- पिता ने समाज को एक आदर्श प्रस्तुत किए हैं। ताकि आप भी सतर्क रहें कि कोई आपके परिचितों पर अपने रसूख का गलत प्रयोग न करे। रुचिका का पंचनामा इस बात का गवाह है कि कैसे पुलिस ने रुचिका की मौत के बाद नए सिरे से राठौर को बचाने की कोशिश शुरू कर दी।
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#100
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इस पंचनामे में तारीख दर्ज है 30 दिसंबर 1993, लेकिन इसमें कहीं भी रुचिका का नाम नजर नहीं आ रहा। मौके पर पहुंचे पुलिसवालों ने पंचनामे में रुचिका का नाम ही नहीं लिखा। यही नहीं रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा का नाम भी बदल दिया गया। पंचनामे में पिता का नाम लिखा है सुभाष चंद्र खत्री यानि राठौर के साथ मिलकर वहां मौजूद पुलिसवालों ने पूरी कोशिश की कि पंचनामे में रुचिका की पहचान छिपा दी जाए। रुचिका के पंचनामे में एक और भयानक साजिश नजर आई। पुलिसवालों ने शुरुआत से ही रुचिका की मौत की वजह को बदलने की कोशिश की। पंचनामे में एक जगह लिखा गया कि रुचिका की मौत वजन घटाने वाली दवा से हुई है। यानि हरियाणा पुलिस के अफसर राठौर की कठपुतली की तरह काम कर रहे थे।
किसी भी वारदात के बाद तैयार किया जाने वाला पंचनामा कानूनी कार्रवाई का सबसे अहम सबूत माना जाता है। लेकिन उसमें छेडछाड मामले को दबाने की ओर इंगित करता है। 1992 से लेकर 1993 के बीच रुचिका के भाई आशु के खिलाफ 6 फर्जी केस दर्ज करवा दिए गए। अक्टूबर 1993 से लेकर दो महीने तक उसे गैरकानूनी तौर पर पुलिस हिरासत में रखा गया। जिस दिन पुलिस ने आशु की परेड रुचिका के सामने कराई उसी दिन वो हार गई। अगले ही दिन 28 दिसंबर 1993 को उसने जहर पी लिया। आशु को गैरकानूनी पुलिस हिरासत से रिहाई रुचिका की मौत के बाद ही मिली।
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