The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012



बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012

POCSO

बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 लोकसभा में पारित किया गया। यह विधेयक पहले 10 मई, 2012 को राज्‍यसभा द्वारा पारित किया गया था।

बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 का प्रारूप, बच्‍चों को यौन उत्‍पीड़न और शोषण से बचाने तथा कानूनी प्रावधानों को मजबूती प्रदान करने के लिए तैयार किया गया। बच्‍चों के प्रति यौन अपराधों के मुद्दे को उल्‍लेखित करने हेतु पहली बार एक विशेष कानून पारित किया गया। वर्तमान समय में यौन अपराध भारतीय दंड संहिता की विभिन्‍न धाराओं के तहत शामिल किये जाते है। आईपीसी के तहत बच्‍चों के खिलाफ सभी यौन अपराधों से निपटने का प्रावधान नहीं है और विशेषकर व्‍यस्‍क और पीडि़त बालक में भेद नही किया जाता। बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 के अनुसार कोई भी व्‍यक्ति जो 18 वर्ष से कम उम्र का हो, बच्‍चे के रूप में परिभाषित किया गया है। यह अधिनियम हर बच्‍चे को जो 18 वर्ष से कम उम्र का हो, उसे यौन उत्‍पीड़न, यौनाचार और अश्‍लीलता से सुरक्षा प्रदान करता है। ये अपराध स्‍पष्‍ट रूप से कानून में पहली बार परिभाषित किये गये। इस अधिनियम के अंतर्गत कठोर दंड का प्रावधान है, जो कि अपराध की गंभीरता के अनुरूप वर्गीकृत है। विभिन्‍न अवधि के लिए साधारण से लेकर सश्रम कारावास तक की सजा हो सकती है। इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है, जो कि अदालत द्वारा तय होगा।

एक अपराध ”संगीन” तब माना जाता है, जब वह किसी विश्‍वस्‍त व्‍यक्ति द्वारा या बच्‍चों के प्राधिकारी जैसे सुरक्षा बल के सदस्‍य, पुलिस अधिकारी, सरकारी कर्मचारी आदि द्वारा किया गया हो।

अधिनियम के अंतर्गत अपराध के लिए ये दंड ‍शामिल है :-

· भेदनीय यौन आक्रमण (धारा 3) – कम से कम सात साल तक का कारावास, जो कि आजीवन कारावास तक का हो सकता है, और (धारा 4) के अनुसार जुर्माना।

· संगीन भेदनीय यौन आक्रमण (धारा 5):- कम से कम दस साल तक का कारावास जो कि आजीवन कारावास तक हो सकता है और (धारा 6) के अनुसार जुर्माना।

· लैंगिक आक्रमण (धारा 7) :- कम से कम तीन साल तक का कारावास जो कि पांच साल तक का हो सकता है और (धारा 8) के अनुसार जुर्माना ।

· संगीन लैंगिक आक्रमण (धारा 9) :- कम से कम पाँच वर्ष तक का कारावास जो कि सात साल तक का हो सकता है और (धारा 10) के अनुसार जुर्माना ।

· बाल यौन उत्पीड़न (धारा 11) – तीन साल तक का कारावास और (धारा 12) के अनुसार जुर्माना।

· अश्लील प्रयोजनों के लिए बालक का प्रयोग (धारा 13) :- पांच साल तक का कारावास और जुर्माना और अपराध घोषित होने के बाद सात साल का कारावास और (धारा 14 (1)) के अनुसार जुर्माना ।

इस अधिनियम के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत की स्थापना का प्रावधान है, जिसमें कि न्यायिक प्रक्रिया के हर चरण में बच्‍चे के हित को सर्वोपरि महत्व दिया जाएगा।

अधिनियम में रिपोर्टिंग, गवाहों की रिकार्डिंग, अपराधों की जांच और परीक्षण में बच्चे के अनुकूल प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है, इनमें शामिल है :

· बच्चे के निवास पर या अपनी पसंद की जगह पर बच्चे के बयान की रिकॉर्डिंग, विशेषकर एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा जो कि उप निरीक्षक के पद से नीचे न हो।

· बच्चे को किसी भी कारणवश रात में पुलिस स्टेशन में न रखा जाए।

· बच्चे के बयान की रिकॉर्डिंग के समय पुलिस अधिकारी वर्दी में नहीं होगा।

· बच्चे के बयान को उसकी मौखिक भाषा के अनुरूप दर्ज किया जाए।

· एक दुभाषिया या अनुवादक की सहायता तथा बच्चे की जरूरत के अनुसार एक विशेषज्ञ की मदद ली जा सकेगी।

· एक अक्षम बच्‍चे के सिलसिले में विशेष शिक्षक या परिचित व्यक्ति की सहायता ली जा सकेगी।

· बच्चे की चिकित्सा परीक्षा माता पिता या किसी अन्य व्यक्ति, जिस पर बच्‍चा विश्‍वास करता हो, उसकी उपस्थिति में ही की जाएगी।

· अगर पीडि़त एक बालिका हो, तब एक महिला डॉक्‍टर द्वारा चिकित्सा परीक्षा आयोजित की जाएगी।

· सुनवाई के दौरान बच्‍चे को नियमित अंतराल-विश्राम दिया जाएगा।

· बालक को बार – बार गवाही देने के लिए नहीं कहा जाएगा।

· कोई आक्रामक पूछताछ या बच्चे के चरित्र का हनन नहीं होगा।

· मामलों की सुनवाई कैमरों की निगरानी में होगी।

इस अधिनियम में अपराध के लिए उकसाने पर भी दंड का प्रावधान है, जो कि अपराध करने पर मिलता है। इन अपराधों में बच्चों को यौन प्रयोजनों के लिए तस्करी करना भी शामिल है।

भेदनीय यौन उत्पीड़न और संगीन भेदनीय उत्‍पीडन, आक्रामक भेदनीय यौन उत्‍पीड़न, यौन उत्‍पीड़न और आक्रामक यौन उत्‍पीड़न जैसे जघन्य अपराधों के लिए साक्ष्‍य जुटाने की जिम्‍मेदारी अभियुक्‍त पर स्थानांतरित की गई है। इस बात का प्रावधान बच्‍चे की नाजुकता और मासूमियत को ध्‍यान में रखकर किया गया है। साथ ही साथ कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए, झूठी शिकायत करने या गलत इरादे से दी गई झूठी जानकारी के लिए भी सजा का प्रावधान है। ऐसी सज़ा जानकारी हासिल करने के कारण अपेक्षाकृत (यानी छह महीने तक ) रखी गई है। यदि एक बच्चे के खिलाफ झूठी शिकायत की जाती है, तो सजा अधिक (यानी एक वर्ष तक) होगी।

मीडिया को विशेष अदालत की अनुमति के बिना बच्चे की पहचान का खुलासा करने से वर्जित किया गया है। मीडिया द्वारा इस प्रावधान का उल्लंघन के लिए सजा छह महीने से एक साल की हो सकती है।

अधिनियम में मुकदमे के शीघ्र निपटान के लिए परीक्षण हेतु बच्चे का साक्ष्य 30 दिनों की अवधि के भीतर दर्ज करने का प्रावधान है। इसके अलावा, विशेष अदालत को एक वर्ष की अवधि के भीतर जहां तक संभव हो, परीक्षण पूरा करना होगा।

बच्चे के राहत और पुनर्वास हेतु, जैसे ही विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपीयू) या स्‍थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज की जाएगी, तब बच्‍चे को सुरक्षा और देखभाल, जैसे कि उन्हें आश्रय गृह या नजदीकी अस्‍पताल में 24 घंटे के भीतर दाखिल कराने के लिए व्‍यवस्‍था करनी होगी। बच्‍चे के पुनर्वास हेतु, विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपीयू) या स्‍थानीय पुलिस को मामले की जानकारी बाल कल्‍याण समिति को शिकायत दर्ज करने के 24 घंटे के भीतर देनी होगी।

इस अधिनियम के तहत केन्द्र और राज्य सरकारों को संचार माध्‍यम जैसे टेलीविजन, रेडियो और प्रिंट मीडिया के द्वारा नि‍यमित अंतराल पर आम जनता, बच्‍चों तथा उनके माता-पिता व संरक्षको में जागरूकता पैदा करने की जिम्‍मेदारी तय की है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एससीपीसीआरएस) को नामित अधिनियम के कार्यान्वयन पर नजर रखने का अधिकार दिया गया है।

POCSO has been passed by the Lok Sabha today, 22nd May, 2012. The Bill was earlier passed by the Rajya Sabha on 10th May, 2012.

The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 has been drafted to strengthen the legal provisions for the protection of children from sexual abuse and exploitation. For the first time, a special law has been passed to address the issue of sexual offences against children.

Sexual offences are currently covered under different sections of IPC. The IPC does not provide for all types of sexual offences against children and, more importantly, does not distinguish between adult and child victims.

The Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 defines a child as any person below the age of 18 years and provides protection to all children under the age of 18 years from the offences of sexual assault, sexual harassment and pornography. These offences have been clearly defined for the first time in law. The Act provides for stringent punishments, which have been graded as per the gravity of the offence. The punishments range from simple to rigorous imprisonment of varying periods. There is also provision for fine, which is to be decided by the Court.

An offence is treated as “aggravated” when committed by a person in a position of trust or authority of child such as a member of security forces, police officer, public servant, etc.

Punishments for Offences covered in the Act are:

· Penetrative Sexual Assault (Section 3) – Not less than seven years which may extend to imprisonment for life, and fine (Section 4)

· Aggravated Penetrative Sexual Assault (Section 5) –­ Not less than ten years which may extend to imprisonment for life, and fine (Section 6)

· Sexual Assault (Section 7) – Not less than three years which may extend to five years, and fine (Section 8)

· Aggravated Sexual Assault (Section 9) – Not less than five years which may extend to seven years, and fine (Section 10)

· Sexual Harassment of the Child (Section 11) – Three years and fine (Section 12)

· Use of Child for Pornographic Purposes (Section 13) – Five years and fine and in the event of subsequent conviction, seven years and fine (Section 14 (1))

The Act provides for the establishment of Special Courts for trial of offences under the Act, keeping the best interest of the child as of paramount importance at every stage of the judicial process. The Act incorporates child friendly procedures for reporting, recording of evidence, investigation and trial of offences. These include:

· Recording the statement of the child at the residence of the child or at the place of his choice, preferably by a woman police officer not below the rank of sub-inspector

· No child to be detained in the police station in the night for any reason.

· Police officer to not be in uniform while recording the statement of the child

· The statement of the child to be recorded as spoken by the child

· Assistance of an interpreter or translator or an expert as per the need of the child

· Assistance of special educator or any person familiar with the manner of communication of the child in case child is disabled

· Medical examination of the child to be conducted in the presence of the parent of the child or any other person in whom the child has trust or confidence.

· In case the victim is a girl child, the medical examination shall be conducted by a woman doctor.

· Frequent breaks for the child during trial

· Child not to be called repeatedly to testify

· No aggressive questioning or character assassination of the child

· In-camera trial of cases

The Act recognizes that the intent to commit an offence, even when unsuccessful for whatever reason, needs to be penalized. The attempt to commit an offence under the Act has been made liable for punishment for upto half the punishment prescribed for the commission of the offence.

The Act also provides for punishment for abetment of the offence, which is the same as for the commission of the offence. This would cover trafficking of children for sexual purposes.

For the more heinous offences of Penetrative Sexual Assault, Aggravated Penetrative Sexual Assault, Sexual Assault and Aggravated Sexual Assault, the burden of proof is shifted on the accused. This provision has been made keeping in view the greater vulnerability and innocence of children. At the same time, to prevent misuse of the law, punishment has been provided for making false complaint or proving false information with malicious intent. Such punishment has been kept relatively light (six months) to encourage reporting. If false complaint is made against a child, punishment is higher (one year).

The media has been barred from disclosing the identity of the child without the permission of the Special Court. The punishment for breaching this provision by media may be from six months to one year.

For speedy trial, the Act provides for the evidence of the child to be recorded within a period of 30 days. Also, the Special Court is to complete the trial within a period of one year, as far as possible.

To provide for relief and rehabilitation of the child, as soon as the complaint is made to the Special Juvenile Police Unit (SJPU) or local police, these will make immediate arrangements to give the child, care and protection such as admitting the child into shelter home or to the nearest hospital within twenty-four hours of the report. The SJPU or the local police are also required to report the matter to the Child Welfare Committee within 24 hours of recording the complaint, for long term rehabilitation of the child.

The Act casts a duty on the Central and State Governments to spread awareness through media including the television, radio and the print media at regular intervals to make the general public, children as well as their parents and guardians aware of the provisions of this Act.

The National Commission for the Protection of Child Rights (NCPCR) and State Commissions for the Protection of Child Rights (SCPCRs) have been made the designated authority to monitor the implementation of the Act.



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